✍️ सुभाष चन्द्र जोशी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति कभी पद, प्रचार या व्यक्तिगत सम्मान में नहीं रही, बल्कि निस्वार्थ सेवा, सादगी, अनुशासन और राष्ट्र प्रथम की भावना में रही है। दायित्व सम्मान का विषय नहीं, बल्कि अधिक उत्तरदायित्व का दायित्व है। यदि संगठन की मूल कार्यसंस्कृति में प्रदर्शन, व्यक्तिकेंद्रित प्रचार और औपचारिक सम्मान की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो यह आत्ममंथन का विषय है। समय के साथ कार्यपद्धति बदल सकती है, किंतु संगठन के मूल मूल्य—विनम्रता, त्याग, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा—अपरिवर्तनीय रहने चाहिए। यही परंपरा संगठन की वास्तविक पहचान और स्थायी शक्ति है।” “दायित्व का अर्थ सम्मान प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को और अधिक सेवा, अनुशासन तथा उत्तरदायित्व के लिए समर्पित करना है। संगठन की प्रतिष्ठा व्यक्ति के प्रचार से नहीं, बल्कि कार्यकर्ता की सादगी और कर्तव्यनिष्ठा से निर्मित होती है।” किसी भी वैचारिक संगठन की दीर्घायु का आधार उसके कार्यकर्ताओं की संख्या नहीं, बल्कि उसके संस्कार होते हैं। संगठन तब तक जीवंत रहता है, जब तक उसके भीतर पद से अधिक दायित्व, सम्मान से अधिक सेवा और व्यक्ति से अधिक विचार का महत्व बना रहता है। जैसे ही यह संतुलन बदलने लगता है, संगठन की आत्मा पर भी उसका प्रभाव दिखाई देने लगता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लगभग एक शताब्दी की यात्रा इस दृष्टि से अद्वितीय रही है। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को कभी पद प्राप्ति का नहीं, बल्कि दायित्व निर्वहन का संस्कार दिया। यहाँ किसी उत्तरदायित्व को उपलब्धि नहीं, बल्कि अधिक श्रम, अधिक त्याग और अधिक उत्तरदायित्व का अवसर माना गया। इसलिए संघ की परंपरा में नया दायित्व मिलने पर आत्मप्रचार नहीं, बल्कि आत्ममंथन की भावना दिखाई देती थी। संघ के प्रारंभिक प्रचारकों का जीवन इस कार्यसंस्कृति का सजीव उदाहरण था। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में देश के कोने-कोने में संगठन का विस्तार किया। सीमित संसाधन, कठिन यात्राएँ, साधारण जीवन और निरंतर प्रवास—यही उनका दैनिक जीवन था। उन्होंने कभी मंच, माला, अभिनंदन या व्यक्तिगत प्रसिद्धि की अपेक्षा नहीं की। समाज ने उन्हें उनके कार्य से पहचाना, उन्होंने स्वयं को कभी प्रचार का विषय नहीं बनाया। संघ की शाखा में स्वयंसेवक को प्रारंभ से ही यह शिक्षा दी जाती है कि कार्य का श्रेय व्यक्ति को नहीं, संगठन और राष्ट्र को मिलना चाहिए। इसी कारण संघ में व्यक्ति नहीं, विचार केंद्र में रहता है। यही वह कार्यपद्धति है जिसने हजारों ऐसे कार्यकर्ता तैयार किए, जिन्होंने जीवनभर राष्ट्रकार्य किया, किंतु व्यक्तिगत पहचान की आकांक्षा नहीं रखी। समय बदलता है और उसके साथ कार्य करने के साधन भी बदलते हैं। आज संचार के आधुनिक माध्यम संगठन के लिए भी आवश्यक हैं। समाज तक विचार पहुँचाने के लिए तकनीक का उपयोग होना चाहिए, किंतु यदि वही तकनीक व्यक्ति-केंद्रित प्रचार का माध्यम बनने लगे, तो यह आत्मचिंतन का विषय अवश्य है। किसी कार्यकर्ता को नया दायित्व मिलने पर यदि उसका स्वागत, अभिनंदन और प्रचार ही मुख्य विषय बन जाए, तो कहीं न कहीं मूल उद्देश्य पीछे छूटने लगता है। यह प्रश्न किसी व्यक्ति या किसी एक घटना का नहीं है। यह संगठनात्मक संस्कृति का प्रश्न है। यदि दायित्व सेवा के स्थान पर प्रतिष्ठा का प्रतीक बनने लगे, यदि मालाएँ, पटके, अभिनंदन समारोह और सामाजिक माध्यमों की प्रशंसा कार्य का मापदंड बनने लगें, तो संगठन की मूल कार्यशैली पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। किसी भी वैचारिक संगठन की सबसे बड़ी पूँजी उसका नैतिक अनुशासन होता है; यदि वही धीरे-धीरे औपचारिकता और प्रदर्शन के आवरण में ढकने लगे, तो आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है। संघ का इतिहास बताता है कि उसने कभी व्यक्तिपूजा को स्थान नहीं दिया। स्वयं संघ के सर्वोच्च दायित्वों का निर्वहन करने वाले अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जिया। उनके जीवन में पद था, पर पद का प्रदर्शन नहीं; उत्तरदायित्व था, पर अधिकार का आग्रह नहीं; नेतृत्व था, पर व्यक्तित्व का प्रचार नहीं। यही संघ की वास्तविक कार्यसंस्कृति रही है। आज संघ अपनी शताब्दी के बाद के नए चरण में प्रवेश कर चुका है। ऐसे समय में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि संगठन अपने मूल संस्कारों को नई पीढ़ी तक उसी प्रामाणिकता के साथ पहुँचाए। आधुनिकता का स्वागत होना चाहिए, किंतु आधुनिकता का अर्थ अपनी मूल पहचान से विमुख होना नहीं हो सकता। तकनीक बदल सकती है, कार्य के माध्यम बदल सकते हैं, संवाद की शैली बदल सकती है, किंतु सादगी, विनम्रता, आत्मानुशासन और निस्वार्थ सेवा जैसे मूल्य कभी अप्रासंगिक नहीं होते। यह भी स्मरण रखने योग्य है कि संघ का स्वयंसेवक किसी सम्मान का आकांक्षी नहीं होता। उसका सबसे बड़ा पुरस्कार समाज का विश्वास और राष्ट्र की उन्नति है। यदि वह अपने दायित्व को साधना समझकर निभाता है, तो वही उसकी वास्तविक उपलब्धि है। इसके विपरीत यदि दायित्व के साथ सम्मान, प्रचार और व्यक्तिगत स्वीकार्यता की अपेक्षा जुड़ने लगे, तो संगठन की वैचारिक दिशा प्रभावित होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। आज आवश्यकता किसी पर दोषारोपण की नहीं, बल्कि आत्मावलोकन की है। संगठन जितना बड़ा होता है, उसके आचरण का प्रभाव भी उतना ही व्यापक होता है। इसलिए प्रत्येक स्वयंसेवक, प्रत्येक अधिकारी और प्रत्येक दायित्ववान कार्यकर्ता का व्यवहार संगठन के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। सादगी केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि संगठनात्मक शक्ति है; विनम्रता केवल व्यवहार नहीं, बल्कि वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण है। अंततः यह स्मरण रखना होगा कि संगठन का वैभव उसके नेताओं की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके कार्यकर्ताओं की निस्वार्थ साधना से निर्मित होता है। यदि दायित्व सेवा का पर्याय बना रहेगा, यदि व्यक्ति स्वयं को संगठन से बड़ा नहीं मानेगा और यदि राष्ट्र सर्वोपरि रहेगा, तो संगठन की आगामी शताब्दी भी उतनी ही तेजस्वी और प्रेरणादायी होगी, जितनी उसकी पहली रही है। यही वह मार्ग है, जिस पर चलते हुए कोई भी संगठन अपनी आत्मा, अपनी परंपरा और अपने उद्देश्य—तीनों की रक्षा कर सकता है। Post navigation भीड़ बढ़ी, संस्कार घटे? कैलाश विजयवर्गीय के बयान के बहाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिशा, दशा और व्यक्ति निर्माण की परंपरा पर एक विमर्श एथेनॉल की राह में सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकार पहले स्वयं भरोसे की मिसाल बनेगी?