“मैं अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता नहीं था।” “मैंने चढ़ावा नहीं गिना।” “मेरे पास चेकबुक नहीं थी।” यदि किसी संस्था का शीर्ष पदाधिकारी किसी गंभीर आर्थिक अनियमितता के बाद अपनी सफाई में यही तर्क दे, तो यह कानूनी बचाव का आधार हो सकता है, लेकिन क्या यह नैतिक उत्तरदायित्व से भी मुक्त कर देता है? यही सबसे बड़ा प्रश्न आज श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देवगिरी द्वारा जारी पत्र के बाद खड़ा हुआ है। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि वे न तो भुगतान के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थे, न ही चढ़ावा गिनने की प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका थी। उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग भी की है। यदि उनके सभी दावे सही भी मान लिए जाएं, तब भी यह प्रश्न समाप्त नहीं होता कि क्या किसी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े संस्थान के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी केवल हस्ताक्षर करने तक सीमित होती है? हर संस्था में अलग-अलग पदों के अलग-अलग अधिकार होते हैं। संभव है कि कोषाध्यक्ष स्वयं भुगतान न करता हो, चेक पर हस्ताक्षर न करता हो और नकदी की गिनती भी उसके अधीन न होती हो। यह प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। लेकिन किसी भी संस्था का वित्तीय प्रमुख या कोषाध्यक्ष उस व्यवस्था का संरक्षक अवश्य होता है। यदि करोड़ों रुपये का चढ़ावा प्रतिदिन आ रहा है, तो उसके सुरक्षित संग्रहण, पारदर्शी लेखांकन, समयबद्ध ऑडिट, निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था मजबूत है या नहीं—यह देखना उसकी नैतिक जिम्मेदारी अवश्य है। इसीलिए किसी भी संस्था में वित्तीय अनियमितता होने पर केवल कैशियर नहीं, बल्कि वित्तीय व्यवस्था देखने वाले वरिष्ठ पदाधिकारी भी जवाबदेही के दायरे में आते हैं। राम मंदिर केवल एक धार्मिक परिसर नहीं है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। इस मंदिर से जुड़े ट्रस्ट के पदाधिकारी पूरे देश में सम्मानित होते हैं। उन्हें मंच मिलते हैं, समाज में प्रतिष्ठा मिलती है और उनके शब्दों को महत्व दिया जाता है। जब पद सम्मान देता है तो संकट के समय वही पद उत्तरदायित्व भी मांगता है। यदि व्यवस्था उत्कृष्ट होती तो उसका श्रेय भी ट्रस्ट और उसके पदाधिकारियों को मिलता। फिर यदि व्यवस्था में गंभीर चूक हुई है तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि “मैं सीधे शामिल नहीं था।” यदि किसी बैंक में हजारों करोड़ का घोटाला हो जाए और वित्त प्रमुख कहे कि उसने स्वयं पैसे नहीं निकाले, क्या समाज उसे पूरी तरह निर्दोष मान लेगा? यदि किसी अस्पताल में दवाइयों की चोरी हो जाए और अधीक्षक कहे कि उसने स्वयं दवा नहीं बांटी, तो क्या उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाएगी? यदि किसी विश्वविद्यालय में परीक्षा घोटाला हो जाए और कुलपति कहें कि उन्होंने स्वयं उत्तर पुस्तिकाएं नहीं जांचीं, तो क्या उनसे कोई प्रश्न नहीं पूछा जाएगा? स्पष्ट है कि प्रशासनिक पद का अर्थ केवल स्वयं कार्य करना नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को सुरक्षित रखना भी होता है। भगवान श्रीराम का जीवन उत्तरदायित्व का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि गलती किसी और की थी, इसलिए मैं उत्तरदायी नहीं हूं। उन्होंने हर परिस्थिति में स्वयं को मर्यादा और जवाबदेही के सर्वोच्च मानदंड पर रखा। यदि श्रीराम के नाम पर बनी संस्था में बैठे लोग भी उसी आदर्श को अपनाएं, तो पहला उत्तर होगा—”यदि व्यवस्था में कहीं कमी रह गई, तो हम उसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं और उसे सुधारेंगे।” स्वामी गोविंद देवगिरी ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि इतनी बड़ी चोरी का समाचार उन्हें भी अत्यंत दुखद लगा और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह स्वागतयोग्य बात है। लेकिन इससे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि लंबे समय से व्यवस्था में कोई कमी थी, तो क्या उसे पहले नहीं पहचाना जाना चाहिए था? यदि ऑडिट नियमित थे, यदि नियंत्रण प्रणाली प्रभावी थी, तो इतनी बड़ी कथित अनियमितता सामने कैसे आई? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर जनता जानना चाहती है।मंदिर की प्रतिष्ठा बचाने का एक ही रास्ता है—पूर्ण पारदर्शिता यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का विषय है। विश्वास तभी मजबूत होगा जब— जांच पूरी तरह स्वतंत्र हो।दोषी चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई हो।ट्रस्ट की पूरी वित्तीय प्रणाली सार्वजनिक समीक्षा के योग्य बनाई जाए। चढ़ावे की गिनती, ऑडिट और डिजिटल निगरानी की आधुनिक व्यवस्था लागू हो। शीर्ष पदाधिकारी नैतिक जवाबदेही स्वीकार करने की परंपरा स्थापित करें। कानून यह तय करेगा कि अपराध किसने किया। जांच एजेंसियां यह बताएंगी कि दोषी कौन है। लेकिन नैतिकता का निर्णय अदालत से पहले व्यक्ति की अपनी अंतरात्मा करती है। यदि कोई व्यक्ति राम मंदिर जैसे विश्व के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थानों में शीर्ष पद पर है, तो उससे अपेक्षा केवल प्रशासनिक दक्षता की नहीं, बल्कि सर्वोच्च नैतिक आदर्श की भी होती है। भगवान श्रीराम के मंदिर में बैठे प्रत्येक पदाधिकारी को स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए— “क्या मैंने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन उसी ईमानदारी और सजगता से किया, जिसकी अपेक्षा करोड़ों रामभक्त मुझसे करते हैं?” यदि उत्तर “हाँ” है, तो जांच उसे निर्दोष सिद्ध कर देगी।यदि उत्तर “नहीं” है, तो भले ही कानून दोष सिद्ध न कर पाए, इतिहास और समाज उस चूक को अवश्य याद रखेंगे। यह समय किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को मजबूत बनाने का है। फिर भी यह स्पष्ट है कि उच्च पद केवल सम्मान का प्रतीक नहीं होता, बल्कि वह उत्तरदायित्व और जवाबदेही का भी प्रतीक होता है।राम मंदिर केवल पत्थरों का भव्य निर्माण नहीं, बल्कि सत्य, मर्यादा और धर्म का प्रतीक है। इसलिए उसकी व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति से भी वही आदर्श अपेक्षित हैं। कानून अपना निर्णय देगा, लेकिन नैतिकता का निर्णय प्रत्येक पदाधिकारी को स्वयं अपनी अंतरात्मा के सामने देना होगा। यही श्रीराम का मार्ग है, यही रामराज्य का आधार है। Post navigation बेलगाम में 10 से 12 जुलाई तक होगी संघ के प्रांत प्रचारकों की अंतिम बैठक, नई संगठनात्मक संरचना पर रहेगा फोकस