‍भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ लिए जा रहे निर्णय आने वाले कई दशकों की ऊर्जा नीति, कृषि अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था को प्रभावित करेंगे। पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना, किसानों को गन्ने, मक्का और अन्य फसलों के बेहतर मूल्य उपलब्ध कराना तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना निस्संदेह ऐसे लक्ष्य हैं जिनसे किसी भी जिम्मेदार नागरिक को आपत्ति नहीं हो सकती। इन्हीं उद्देश्यों को सामने रखकर केंद्र सरकार एथेनॉल मिश्रित ईंधन को तेजी से बढ़ावा दे रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी अनेक अवसरों पर पूरे विश्वास के साथ कह चुके हैं कि एथेनॉल भारत के भविष्य का ईंधन है और यह पूरी तरह सुरक्षित है। उनके इस विश्वास के पीछे ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आर्थिक समृद्धि का व्यापक दृष्टिकोण है। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि किसी भी नीति की सफलता केवल सरकार के विश्वास से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से तय होती है।
आज देश में एथेनॉल को लेकर जो चर्चा चल रही है, उसका मूल कारण किसी नई तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उस तकनीक के दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर उत्पन्न हुई स्वाभाविक जिज्ञासा और आशंका है। देश के अनेक हिस्सों से वाहन मालिकों, मैकेनिकों और कुछ ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर ऐसे अनुभव साझा किए गए हैं जिनमें अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन के उपयोग के बाद माइलेज में कमी, इंजन की कार्यक्षमता में परिवर्तन, ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर प्रभाव अथवा रखरखाव की लागत बढ़ने जैसी बातें कही गई हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि आधुनिक तकनीक से बने अनेक वाहन ऐसे ईंधन के अनुरूप तैयार किए जा रहे हैं और सभी वाहनों में एक जैसी समस्याएँ सामने नहीं आतीं। इसलिए यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हर वाहन प्रभावित होगा और यह कहना भी पर्याप्त नहीं होगा कि किसी प्रकार की समस्या हो ही नहीं सकती। सत्य संभवतः इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं स्थित है और इसलिए आवश्यकता वैज्ञानिक परीक्षण, पारदर्शी संवाद और विश्वसनीय प्रमाणों की है।
आम नागरिक की चिंता को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया मान लेना उचित नहीं होगा। भारत में अधिकांश परिवार वर्षों की मेहनत की कमाई या बैंक ऋण के सहारे वाहन खरीदते हैं। उनके लिए वाहन केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक जीवन की आवश्यकताओं का अभिन्न हिस्सा होता है। यदि ऐसी स्थिति में कोई नई ईंधन नीति लागू होती है और उसके संभावित प्रभावों को लेकर प्रश्न उठते हैं, तो उन प्रश्नों का सम्मान होना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का प्रश्न सरकार के लिए असुविधा नहीं, बल्कि नीति को और अधिक मजबूत बनाने का अवसर होता है।
यही कारण है कि आज आवश्यकता केवल यह कहने की नहीं है कि एथेनॉल सुरक्षित है, बल्कि यह दिखाने की भी है कि वह व्यवहारिक रूप से उतना ही सुरक्षित है जितना दावा किया जा रहा है। यदि सरकार को इस नीति की सफलता और वैज्ञानिक आधार पर पूरा विश्वास है, तो एक व्यावहारिक और प्रभावी पहल यह हो सकती है कि इसके व्यापक उपयोग की शुरुआत सबसे पहले सरकारी तंत्र से की जाए। केंद्र और राज्य सरकारों के विभागीय वाहन, प्रशासनिक अधिकारियों की गाड़ियाँ, सरकारी परिवहन निगमों की बसें और अन्य सार्वजनिक वाहन एक निश्चित अवधि तक पूर्ण रूप से एथेनॉल आधारित ईंधन पर संचालित किए जाएँ। इस दौरान उनके माइलेज, इंजन की स्थिति, रखरखाव व्यय, पुर्जों की गुणवत्ता और परिचालन लागत का स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्थानों से मूल्यांकन कराया जाए तथा उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएँ। जब जनता अपने सामने प्रमाण देखेगी, तब विश्वास किसी प्रचार अभियान से नहीं, बल्कि अनुभव और पारदर्शिता से निर्मित होगा।
लोकतंत्र में सबसे प्रभावशाली संदेश भाषण नहीं, बल्कि उदाहरण होता है। जब सरकार स्वयं किसी नई व्यवस्था को अपनाकर उसके परिणाम जनता के सामने रखती है, तब नागरिकों के मन में विश्वास स्वतः उत्पन्न होता है। यही सिद्धांत एथेनॉल नीति पर भी लागू हो सकता है। यदि सरकारी स्तर पर व्यापक और सफल प्रयोग सामने आते हैं, तो शायद वे सभी आशंकाएँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी जो आज सोशल मीडिया, गैराजों और उपभोक्ताओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
इस पूरी बहस का उद्देश्य एथेनॉल का विरोध करना नहीं है और न ही ऊर्जा आत्मनिर्भरता जैसे राष्ट्रीय लक्ष्य पर प्रश्नचिह्न लगाना है। उद्देश्य केवल इतना है कि जिस परिवर्तन का प्रभाव करोड़ों वाहन मालिकों पर पड़ने वाला है, उसमें पारदर्शिता, वैज्ञानिक परीक्षण और उपभोक्ता विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। किसी भी नीति की वास्तविक शक्ति उसके पीछे खड़ी जनता होती है। यदि जनता को यह विश्वास हो जाए कि सरकार उसकी आशंकाओं को सुन रही है, स्वतंत्र परीक्षण करा रही है और किसी संभावित समस्या की स्थिति में उसके हितों की रक्षा के लिए भी तैयार है, तो एथेनॉल की राह कहीं अधिक सहज और मजबूत हो जाएगी।
भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना ही होगा। किसानों को नए अवसर भी मिलने चाहिए और पर्यावरण संरक्षण भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। लेकिन विकास की यात्रा तभी स्थायी होती है, जब उसमें नीति की दूरदृष्टि के साथ जनता का विश्वास भी शामिल हो। इसलिए एथेनॉल पर सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि वह भविष्य का ईंधन बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसके भविष्य की नींव जनता के विश्वास पर रखी जाएगी। यदि इस प्रश्न का उत्तर सरकार अपने आचरण, पारदर्शिता और वैज्ञानिक प्रमाणों से देती है, तो एथेनॉल केवल एक वैकल्पिक ईंधन नहीं रहेगा, बल्कि भारत की ऊर्जा क्रांति का ऐसा अध्याय बनेगा जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व कर सकेंगी।

By उत्तराखंड संवाद भारती

उत्तराखंड संवाद भारती उत्तराखंड सहित देश-दुनिया की ताज़ा, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *