✍️ सुभाष चन्द्र जोशी

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री के रूप में पांच वर्ष पूरे कर लिए हैं। राज्य गठन के बाद यह पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी का कोई मुख्यमंत्री लगातार पांच साल तक सत्ता में रहा है। यह केवल राजनीतिक स्थिरता का संकेत नहीं, बल्कि उस नेतृत्व पर पार्टी के भरोसे का भी प्रमाण है, जिसने कम समय में राज्य की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल कार्यकाल की अवधि से नहीं, बल्कि उसके फैसलों के प्रभाव और जनता के जीवन में आए बदलाव से होता है।
पिछले पांच वर्षों में धामी सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए, जिन्होंने उत्तराखंड को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करना, सख्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून में संशोधन, भू-कानून, महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण और सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने जैसे फैसले सरकार की पहचान बन गए। भाजपा इन्हें निर्णायक नेतृत्व और चुनावी वादों को पूरा करने का उदाहरण बताती है। यह भी सच है कि इनमें से कई फैसले राजनीतिक जोखिम वाले थे, लेकिन सरकार पीछे नहीं हटी।
सबसे अधिक चर्चा यूसीसी को लेकर हुई। उत्तराखंड इस कानून को लागू करने वाला पहला राज्य बना। इससे मुख्यमंत्री धामी की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मजबूत हुई। हालांकि किसी भी बड़े सामाजिक कानून की सफलता केवल उसके लागू होने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन और समाज में स्वीकार्यता से तय होती है। इसलिए यूसीसी का वास्तविक मूल्यांकन आने वाले वर्षों में ही संभव होगा।
नकल विरोधी कानून भी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। पेपर लीक और भर्ती घोटालों से परेशान युवाओं के बीच इस कानून ने भरोसा जगाने का प्रयास किया। लेकिन केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। यदि समय पर भर्ती परीक्षाएं नहीं होंगी, रिक्त पद नहीं भरेंगे और युवाओं को रोजगार नहीं मिलेगा, तो कानून का प्रभाव सीमित ही रहेगा।
धामी सरकार ने निवेश आकर्षित करने के लिए ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित की और बड़े निवेश समझौतों का दावा किया। राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी और जी-20 की बैठकों ने भी उत्तराखंड की छवि को मजबूती दी। लेकिन निवेश का वास्तविक अर्थ तब है, जब वह उद्योगों, स्थानीय रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचे। अभी भी यह सवाल बना हुआ है कि घोषित निवेश का कितना हिस्सा धरातल पर उतर पाया है।
दूसरी ओर सरकार के सामने कई ऐसे मुद्दे भी हैं, जिन पर अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। उत्तराखंड में बेरोजगारी अब भी युवाओं की सबसे बड़ी चिंता है। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है और निजी क्षेत्र में पर्याप्त अवसर नहीं बन पाए हैं। पलायन की समस्या भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। पर्वतीय क्षेत्रों के अनेक गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं और रोजगार के अभाव में खाली हो रहे हैं। यदि उत्तराखंड को वास्तव में आत्मनिर्भर बनाना है तो पहाड़ों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों को नई ऊर्जा देनी होगी।
स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार की काफी गुंजाइश है। दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पद और बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी चुनौती बने हुए हैं। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सरकार की सक्रियता सराहनीय रही, लेकिन उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में केवल राहत और बचाव कार्य पर्याप्त नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
राजनीतिक दृष्टि से भी धामी सरकार का कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा। “लैंड जिहाद”, “थूक जिहाद”, मदरसा बोर्ड और अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े फैसलों ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ी। समर्थकों ने इन्हें कानून व्यवस्था और सांस्कृतिक संरक्षण से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने इन्हें सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाने वाला बताया। लोकतंत्र में ऐसे मुद्दों पर मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी है कि विकास और सामाजिक सौहार्द साथ-साथ आगे बढ़ें।
पांच वर्षों में यह स्पष्ट हुआ कि पुष्कर सिंह धामी ने खुद को केवल एक युवा मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाले नेता के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिन्हें राजनीतिक रूप से कठिन माना जाता था। लेकिन अब उनके सामने अगली चुनौती और भी बड़ी है। जनता केवल कानूनों और घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगी; वह रोजगार, बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, पलायन पर रोक और मजबूत अर्थव्यवस्था जैसे ठोस परिणाम भी देखना चाहेगी।
धामी सरकार के पहले पांच वर्ष इस बात का संकेत देते हैं कि उत्तराखंड में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नहीं है। अब जरूरत है कि यही इच्छाशक्ति विकास, रोजगार और जनकल्याण के मोर्चे पर भी उसी मजबूती से दिखाई दे। अंततः किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि वही होती है, जिसका असर आम नागरिक के जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई दे। यही कसौटी धामी सरकार का वास्तविक मूल्यांकन करेगी।

By उत्तराखंड संवाद भारती

उत्तराखंड संवाद भारती उत्तराखंड सहित देश-दुनिया की ताज़ा, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *