कुरूड़ समिति 2026 में ‘बड़ी जात’ पर अडिग, जबकि राजजात समिति 2027 में यात्रा कराने की बात पर कायम

थराली। विश्व प्रसिद्ध श्री नंदा देवी राजजात यात्रा के आयोजन वर्ष को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्ष 2026 में ‘श्री नंदा देवी बड़ी जात’ आयोजित होगी और उसके बाद 2027 में राजजात यात्रा निकाली जाएगी? इस प्रश्न ने नंदा देवी के श्रद्धालुओं और यात्रा से जुड़े क्षेत्रों में व्यापक चर्चा छेड़ दी है।

एक ओर श्री नंदा देवी सिद्धपीठ कुरूड़ बड़ी जात आयोजन समिति ने 5 से 30 सितंबर 2026 तक बड़ी जात आयोजित करने का ऐलान किया है, वहीं श्री नंदा देवी राजजात समिति लगातार वर्ष 2027 में राजजात यात्रा कराने की बात कह रही है। दोनों पक्षों के अलग-अलग रुख से श्रद्धालुओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

उत्तराखंड गठन से जुड़ा रहा है राजजात का इतिहास

उत्तराखंड राज्य बनने से पहले वर्ष 2000 में आयोजित श्री नंदा देवी राजजात यात्रा में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया था। यात्रा के समापन के महज 36 दिन बाद, 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना। इसे अनेक श्रद्धालु मां नंदा देवी का आशीर्वाद भी मानते हैं।

12 वर्षीय परंपरा के अनुसार अगली राजजात 2012 में प्रस्तावित थी, लेकिन मलमास के कारण इसे 2013 तक टाल दिया गया। वर्ष 2013 में तैयारियां पूरी गति से चल रही थीं, तभी केदारनाथ आपदा ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। राज्य सरकार के अनुरोध और मानवीय परिस्थितियों को देखते हुए यात्रा स्थगित कर दी गई।

इसके बाद वर्ष 2014 में यात्रा का सफल आयोजन हुआ। 18 अगस्त से 6 सितंबर 2014 तक चली इस राजजात में अपेक्षा से कहीं अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। आयोजन की सफलता के बाद तत्कालीन सरकार ने वर्ष 2026 में राजजात को और अधिक भव्य स्वरूप में आयोजित करने की मंशा भी जताई थी।


राजजात के सियासी इत्तफाक से दूरी बना रही धामी सरकार?

थराली। श्री नंदा देवी राजजात यात्रा-2026 को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग इसे महज संयोग मानते हैं, जबकि कुछ का दावा है कि जिस सरकार के कार्यकाल में राजजात का आयोजन हुआ, वह अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।

इस धारणा के समर्थन में पिछले आयोजनों का हवाला दिया जाता है। वर्ष 1987 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सरकार के दौरान राजजात आयोजित हुई, लेकिन 1989 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। वर्ष 2000 की राजजात भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई, जिसके बाद 2002 के चुनाव में भाजपा सत्ता से हट गई। इसी तरह 2014 में उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार ने राजजात के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे भी हार का सामना करना पड़ा।

इसी क्रम में कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि 2026 की प्रस्तावित राजजात को लेकर धामी सरकार की शुरुआती सक्रियता बाद में धीमी पड़ गई। मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठकों के बावजूद अब तक आयोजन को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है। सरकार की ओर से मलमास, सितंबर में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित बर्फबारी और तैयारियों जैसे कारणों का उल्लेख किया गया है।

हालांकि, सरकार ने इस कथित ‘सियासी इत्तफाक’ को कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है और न ही इसे राजजात के आयोजन से जोड़कर कोई बयान दिया है। ऐसे में यह चर्चा फिलहाल केवल राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चल रही अटकलों तक ही सीमित है।


2025 तक दिखी तैयारी, फिर धीमी पड़ गई रफ्तार

वर्ष 2025 की शुरुआत में राज्य सरकार ने राजजात की तैयारियों को लेकर सक्रियता दिखाई। मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और वरिष्ठ अधिकारियों की कई उच्चस्तरीय बैठकें हुईं। आयोजन समिति ने भी लगातार बैठकें कर तैयारियां शुरू कर दी थीं। इससे उम्मीद जगी कि 2026 की राजजात अब तक की सबसे भव्य यात्रा होगी।

लेकिन वर्ष के अंतिम महीनों तक आते-आते तैयारियों की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसके बाद यात्रा को 2026 में कराने को लेकर सवाल उठने लगे।

मलमास और मौसम बने स्थगन के तर्क

यात्रा को 2027 तक टालने के पक्ष में मलमास, सितंबर में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित बर्फबारी तथा तैयारियों के लिए पर्याप्त समय न होने जैसे तर्क दिए जाने लगे।

इसी बीच 23 जनवरी, बसंत पंचमी को नौटी में आयोजित कार्यक्रम में राजकुंवर डॉ. राकेश कुंवर ने परिस्थितियों का हवाला देते हुए 2027 में राजजात कराने की घोषणा की।

वहीं दूसरी ओर कुरूड़ सिद्धपीठ में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में देवी के पश्वा ने 2026 में ही कैलाश प्रस्थान की इच्छा व्यक्त की, जिसे समर्थक 2026 में बड़ी जात और यात्रा के आयोजन का संकेत मान रहे हैं।

नौटी बनाम कुरूड़, बढ़ा मतभेद

राजजात के आयोजन वर्ष को लेकर अब विवाद केवल तिथियों तक सीमित नहीं रह गया है। नौटी (चंदपुर) और कुरूड़ (बधाण) से जुड़े पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं। बधाण, दशोली, बंड और नंदाक क्षेत्र भी इस मुद्दे पर विभिन्न मतों में बंटे नजर आ रहे हैं।

ऐसे में श्रद्धालुओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर राजजात 2026 में होगी या 2027 में? जब तक इस पर सभी पक्षों और सरकार की ओर से स्पष्ट निर्णय नहीं आता, तब तक असमंजस की स्थिति बनी रहने की संभावना है।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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