पोखरी (चमोली)। एक तरफ देश आजादी का अमृत महोत्सव मनाकर ‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में छलांग लगा रहा है, तो दूसरी तरफ उत्तराखंड के चमोली जिले के विकासखंड पोखरी से सिस्टम को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आई है। यह उस क्षेत्र का हाल है जो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, एक राज्यसभा सांसद, एक पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान स्थानीय विधायक का गृह क्षेत्र है। इसके बावजूद, आज भी यहां बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए ‘चारपाई’ ही एकमात्र एम्बुलेंस है। हाईप्रोफाइल नेताओं का क्षेत्र, फिर भी ग्रामीण बेहाल इस दुर्दशा की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह इलाका सूबे के सबसे रसूखदार नेताओं का गृह क्षेत्र है: लखपत सिंह बुटोला (बदरीनाथ विधायक):इनका पैतृक गांव इसी प्रभावित क्षेत्र के ‘कयूरियाल खर्क’ तोक में है। महेन्द्र प्रसाद भट्ट (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद): यह इनकी गृह तहसील है। राजेंद्र सिंह भंडारी (पूर्व कैबिनेट मंत्री): यह क्षेत्र इनकी भी कर्मभूमि/गृह तहसील के अंतर्गत आता है। नेताओं की इस लंबी फेहरिस्त के बावजूद ग्राम पंचायत विरसण सेरा और इसके पांच तोक—बणेथ, चेमड़ा, कयूरियाल खर्क, भनवाणी और मजयाणी—आजादी के 79वें वर्ष में भी एक अदद सड़क के लिए तरस रहे हैं। पीठ पर राशन, चारपाई पर जिंदगी: ग्रामीणों का रोज का संघर्ष ग्राम प्रधान शंकर सिंह नेगी, सत्येंद्र सिंह नेगी, सुखदेव सिंह और ईश्वर सिंह के अनुसार, इस पूरे इलाके में करीब 170 परिवार (विरसण सेरा: 60, बणेथ: 20, चेमड़ा: 30, कयूरियाल खर्क: 20, भनवाणी-मजयाणी: 40) रहते हैं, जिनकी जिंदगी इन तीन मुख्य समस्याओं के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है। 4 किलोमीटर की जानलेवा चढ़ाई: सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को दैनिक उपयोग का सामान और राशन बाजार से अपनी पीठ पर लादकर 4 किमी की खड़ी चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ती है। चारपाई ही ‘एम्बुलेंस’: सबसे बदतर हालात तब होते हैं जब कोई बुजुर्ग, बच्चा या गर्भवती महिला बीमार होती है। उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीण चारपाई या डोली के सहारे पैदल ले जाते हैं। समय पर इलाज न मिलने के कारण कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। सामाजिक बहिष्कार का दंश: सड़क के अभाव के कारण अब बाहरी लोग इन गांवों में शादियां या रिश्तेदारी करने से कतराने लगे हैं। इससे गांवों का सामाजिक और आर्थिक ढांचा पूरी तरह टूट चुका है और पलायन बढ़ रहा है। “अब वादे नहीं, सड़क चाहिए” — उग्र आंदोलन की चेतावनी ग्रामीणों का कहना है कि वे सालों से जनप्रतिनिधियों के चक्कर काट रहे हैं और प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंप रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ खोखले आश्वासन ही मिले हैं। शासन-प्रशासन की इस बेरुखी से अब ग्रामीणों के सब्र का बांध टूट चुका है। सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क सुविधा के अभाव का प्रभाव सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ रहा है। आवागमन की कठिनाइयों के कारण रोजगार, शिक्षा और अन्य विकास संबंधी अवसर प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार लंबे समय से सड़क निर्माण की मांग उठाई जा रही है, लेकिन अभी तक अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है। वर्षों से उठ रही मांग ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने विभिन्न स्तरों पर जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष सड़क निर्माण की मांग रखी है। उनका कहना है कि क्षेत्र को सड़क संपर्क से जोड़ने से न केवल आवागमन आसान होगा बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी। ग्रामीणों ने शीघ्र कार्रवाई की मांग की ग्रामीणों ने शासन और प्रशासन से विरसण सेरा, बणेथ, चेमड़ा, कयूरियाल खर्क, भनवाणी और मजयाणी को शीघ्र सड़क सुविधा से जोड़ने की मांग की है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए सड़क निर्माण अत्यंत आवश्यक है और इस दिशा में जल्द ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। आर-पार की लड़ाई का ऐलान ग्रामीणों ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है कि यदि विरसण सेरा समेत सभी पांचों तोकों को जल्द ही सड़क मार्ग से नहीं जोड़ा गया, तो वे सड़कों पर उतरकर एक व्यापक जन आंदोलन शुरू करेंगे। इस आंदोलन के कारण पैदा होने वाली किसी भी कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए पूरी तरह से शासन और प्रशासन जिम्मेदार होगा। Post navigation चम्पावत को उत्तराखंड का मॉडल जनपद बनाने का संकल्प, मुख्यमंत्री धामी ने 123.79 करोड़ की विकास योजनाओं का किया लोकार्पण और शिलान्यास हरेला’ पर सजेगा धरा का श्रृंगार, देहरादून में लगेंगे 15.50 लाख पौधे!