देहरादून/बदरीनाथ। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान और चढ़ावे को लेकर सामने आए कथित गबन के मामले के बाद अब उत्तराखंड की श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने भी अपने अधीन संचालित मंदिरों में दान, चढ़ावा और आय-व्यय की व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। समिति के मुख्य कार्याधिकारी द्वारा जारी कार्यालय आदेश में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को दान, चढ़ावे, किराया एवं अन्य आय के रख-रखाव में पूर्ण पारदर्शिता बरतने तथा किसी भी प्रकार की अनियमितता पर कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

हालांकि इस आदेश के सामने आने के बाद धार्मिक संस्थानों के संचालन, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि व्यवस्थाएं पहले से पूरी तरह पारदर्शी थीं तो इस प्रकार का विशेष निर्देश जारी करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।

क्या कहता है बीकेटीसी का आदेश?

2 जुलाई 2026 को जारी कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अयोध्या में दान और चढ़ावे से संबंधित खबरों के मद्देनज़र मंदिर समिति के अधीन सभी मंदिरों में विशेष सतर्कता बरती जाए। आदेश में दान गणना केंद्र, लेखा अनुभाग, खजाना, विश्रामगृह तथा पूजा काउंटर पर तैनात अधिकारियों एवं कर्मचारियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्राप्त धनराशि और सामग्री के रख-रखाव में किसी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता न हो। साथ ही चेतावनी दी गई है कि भविष्य में किसी प्रकार की शिकायत मिलने पर संबंधित के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।

सवालों के घेरे में पारदर्शिता

बीकेटीसी के इस आदेश ने एक बार फिर मंदिरों के वित्तीय प्रबंधन को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चारधाम यात्रा के दौरान हर वर्ष लाखों श्रद्धालु बदरीनाथ, केदारनाथ और समिति के अधीन अन्य मंदिरों में दर्शन करते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु नकद दान, ऑनलाइन दान, स्वर्ण-रजत आभूषण और अन्य भेंट अर्पित करते हैं।

ऐसे में यह मांग तेज हो रही है कि दान और चढ़ावे का वार्षिक विवरण सार्वजनिक किया जाए तथा आय-व्यय का स्वतंत्र ऑडिट भी कराया जाए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो सके।

ऑडिट की मांग क्यों?

धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता की चर्चा नई नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित वित्तीय ऑडिट और सार्वजनिक लेखा-जोखा किसी भी संस्था की विश्वसनीयता को मजबूत करता है। बीकेटीसी के मामले में भी कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों का मत है कि यदि आय-व्यय का विस्तृत विवरण समय-समय पर सार्वजनिक किया जाए तो अनावश्यक विवादों की गुंजाइश कम हो सकती है।

देवस्थानम बोर्ड की फिर चर्चा

इस घटनाक्रम के बाद पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा लागू किए गए देवस्थानम बोर्ड मॉडल की भी चर्चा फिर से तेज हो गई है। कुछ लोग मानते हैं कि संस्थागत ढांचे से जवाबदेही बढ़ सकती है, जबकि दूसरी ओर कई धार्मिक संगठनों का मानना है कि मंदिरों की पारंपरिक व्यवस्था और धार्मिक अधिकारों का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इस विषय पर अलग-अलग मत हैं और यह बहस अभी भी जारी है।

करोड़ों की आस्था, पारदर्शिता की अपेक्षा

चारधाम यात्रा अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। हर वर्ष करोड़ों रुपये का दान और चढ़ावा मंदिरों में आता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की अपेक्षा है कि उनकी आस्था से जुड़े प्रत्येक रुपये का उपयोग पूरी पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही के साथ हो।

बीकेटीसी का हालिया आदेश इसी दिशा में एक प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। हालांकि यह व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होगी, इसका आकलन भविष्य में इसके क्रियान्वयन और पारदर्शिता के स्तर से ही होगा।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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