दिल्ली में पहली बैठक के बाद सीएम आवास में दूसरा दौर, अनिल बलूनी और त्रिवेंद्र रावत बने संवाद के दूत; संगठन और सरकार के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश देहरादून /दिल्ली। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने संगठन और सरकार के भीतर उभर रही नाराजगियों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। पार्टी आलाकमान अब किसी भी तरह के अंदरूनी असंतोष को चुनावी माहौल पर असर डालने से रोकना चाहता है। यही कारण है कि दिल्ली में एक दौर की महत्वपूर्ण बातचीत के बाद अब मुख्यमंत्री आवास में दूसरे दौर की बैठक आयोजित की गई, जिसने राज्य की राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक का मुख्य केंद्र भाजपा विधायक Arvind Pandey से जुड़ी नाराजगी, उनकी असंतुष्टि और सरकार से जुड़े विकास कार्यों के विभिन्न मुद्दे रहे। पार्टी नेतृत्व यह समझ चुका है कि चुनाव से पहले यदि वरिष्ठ नेताओं और प्रभावशाली चेहरों की नाराजगी दूर नहीं की गई, तो इसका असर संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी रणनीति दोनों पर पड़ सकता है। बताया जा रहा है कि भाजपा आलाकमान ने इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए सांसद Anil Baluni और पूर्व मुख्यमंत्री Trivendra Singh Rawat को अहम जिम्मेदारी सौंपी है। दोनों नेताओं को पार्टी और सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा नाराज नेताओं से संवाद बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। इस अहम बैठक में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष Mahendra Bhatt भी मौजूद रहे। राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे से पहले माहौल सुधारने की कोशिश राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों पर लगातार करीबी नजर बनाए हुए है। पार्टी नहीं चाहती कि 2027 चुनाव से पहले कोई भी गुटबाजी या असंतोष सार्वजनिक रूप से बड़ा मुद्दा बने। माना जा रहा है कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के संभावित उत्तराखंड दौरे से पहले संगठन के भीतर चल रही खींचतान को खत्म करने का प्रयास तेज कर दिया गया है। बीजेपी के लिए उत्तराखंड राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व यह सुनिश्चित करना चाहता है कि चुनाव से पहले सरकार और संगठन दोनों एकजुट नजर आएं। सूत्रों की मानें तो नाराज नेताओं को साधने के साथ-साथ विकास कार्यों की गति और जनसंदेश को भी मजबूत करने पर फोकस किया जा रहा है। सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल पर जोर पार्टी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि कई विधायकों और नेताओं की नाराजगी विकास कार्यों, क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक संवाद की कमी को लेकर सामने आ रही है। ऐसे में भाजपा अब संगठन और सरकार के बीच तालमेल को और बेहतर बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव से पहले भाजपा किसी भी प्रकार के असंतोष को लंबा खिंचने देने के पक्ष में नहीं है। पार्टी की कोशिश है कि सभी बड़े नेताओं को साथ लेकर चुनावी तैयारी शुरू की जाए, ताकि विपक्ष को किसी भी तरह का राजनीतिक मुद्दा न मिल सके। क्या पूरी तरह खत्म होगी नाराजगी? हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल बैठकों और संवाद के जरिए माहौल को संभालने की कोशिश जरूर की जा रही है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नेताओं की नाराजगी पूरी तरह खत्म हो पाएगी या चुनाव नजदीक आते-आते फिर से अंदरूनी असंतोष उभर सकता है। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि भाजपा आलाकमान उत्तराखंड में किसी भी तरह की राजनीतिक ढील देने के मूड में नहीं है और 2027 की तैयारी अभी से पूरी गंभीरता के साथ शुरू कर दी गई है। Post navigation चारधाम एवं आदि कैलाश यात्रा मार्गों पर घोड़ा-खच्चरों के संचालन के लिए नई एसओपी लागू देहरादून में मुस्लिम सेवा संगठन की मांग: गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे सरकार