✍️ सुभाष चंद्र जोशी श्री राम मन्दिर में चढ़ावे की चोरी के बाद बदरीनाथ धाम में भी चढ़ावे की चोरी की घटना ने उत्तराखंड के मन्दिरों की धार्मिक व्यवस्था और मंदिर प्रबंधन को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। वर्ष 2019 में उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड के गठन और 2021 में उसके निरसन के समय पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना था। आज भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खुलकर देवस्थानम बोर्ड जैसी व्यवस्था बनाये जाने की वकालत कर रहे हैं। उनका कहना है कि चारधाम जैसे राष्ट्रीय महत्व के तीर्थस्थलों में करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, ऐसे में पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन, आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था, डिजिटल लेखा-जोखा तथा जवाबदेह प्रशासन समय की आवश्यकता है। इसके विपरीत, बदरीनाथ-केदारनाथ से जुड़े तीर्थ पुरोहित, पंडा समाज और हक-हकूकधारी इस विचार का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। उनका मत है कि चारधाम केवल मंदिर नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं, पूजा-पद्धतियों और सामाजिक व्यवस्थाओं के जीवंत केंद्र हैं। वे मानते हैं कि देवस्थानम बोर्ड का अर्थ धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण बढ़ना है, जिससे पारंपरिक अधिकार, धार्मिक स्वायत्तता और हक-हकूक प्रभावित हो सकते हैं और जिन परंपराओं ने सदियों तक इन धामों की गरिमा बनाए रखी, उन्हें किसी प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे विवाद के बीच राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी का संगठन अभी तक स्पष्ट रूप से किसी पक्ष में सामने नहीं आए हैं। संभवतः सरकार तथा भाजपा संगठन इस संवेदनशील विषय पर बिना व्यापक सहमति के कोई नया विवाद खड़ा नहीं करना चाहती। यह भी ध्यान रखना होगा कि वर्ष 2021 में तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय समाज के लंबे आंदोलन के बाद स्वयं भाजपा सरकार ने देवस्थानम बोर्ड को समाप्त किया था। इसलिए आज यदि इस विषय पर फिर विचार होता है तो परिस्थितियाँ, आवश्यकताएँ और सामाजिक सहमति-तीनों का नए सिरे से आकलन करना होगा। दूसरी ओर 2027 में विधान सभा चुनाव होने वाला है और अगर इस विवाद को हवा दी गयी तो इसका असर सीधे वोट पर पड़ेगा, जिसका खतरा न तो सरकार लेना चाहेगी और न ही भाजपा। यह भी एक कटु सत्य है कि बद्रीनाथ में हुई चोरी की घटना यह संकेत अवश्य देती हैं कि मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता, सुरक्षा और जवाबदेही को और मजबूत बनाने के साथ जनविश्वास जीतना जरूरी है। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि केवल एक घटना के आधार पर पूरी वर्तमान व्यवस्था को असफल घोषित कर देना भी उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, यह कहना भी पर्याप्त नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में किसी सुधार की आवश्यकता नहीं है। समय बदल चुका है। चारधाम यात्रा का स्वरूप पहले से कहीं अधिक व्यापक हो गया है। तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ी है, चढ़ावे की राशि बढ़ी है और सुविधाओं की अपेक्षाएँ भी बदली हैं। ऐसे में प्रबंधन प्रणाली का समयानुकूल होना भी आवश्यक है। यहां वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि देवस्थानम बोर्ड बनना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि चारधाम की धार्मिक परंपराओं, तीर्थ पुरोहितों के अधिकारों, हक-हकूकधारियों की ऐतिहासिक भूमिका और आधुनिक प्रशासनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। यदि भविष्य में किसी नई व्यवस्था पर विचार किया जाता है तो वह 2019 के मॉडल की पुनरावृत्ति न होकर उत्तराखंड की परिस्थितियों के अनुरूप एक सहभागी और संतुलित मॉडल होना चाहिए, जिसमें सरकार, बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति, तीर्थ पुरोहित, हक-हकूकधारी, धर्माचार्य, प्रशासनिक विशेषज्ञ और समाज के प्रतिनिधि समान रूप से शामिल हों। धार्मिक परंपराओं और पूजा-पद्धति पर पूर्ण अधिकार परंपरागत व्यवस्था के पास रहे, जबकि वित्तीय प्रबंधन, डिजिटल लेखा-जोखा, सुरक्षा व्यवस्था और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाएँ आधुनिक तकनीक और पारदर्शिता के आधार पर संचालित हों। चारधाम केवल उत्तराखंड की नहीं, बल्कि पूरे भारत की आध्यात्मिक धरोहर हैं। इसलिए इनके प्रबंधन को राजनीतिक बहस का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। किसी भी निर्णय का आधार न तो केवल सरकारी नियंत्रण होना चाहिए और न ही केवल परंपरा के नाम पर सुधारों का विरोध। लोकतांत्रिक समाज में सबसे मजबूत व्यवस्था वही होती है जिसमें परंपरा का सम्मान भी बना रहे और समयानुकूल सुधार भी होते रहें। आज देवस्थानम बोर्ड के समर्थन या विरोध की राजनीति से आगे बढते हुए ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है जो श्रद्धालुओं के विश्वास को मजबूत करे, चढ़ावे और मंदिर संपत्तियों के प्रबंधन को पूर्णतः पारदर्शी बनाए, तीर्थ पुरोहितों और हक-हकूकधारियों के अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करे तथा चारधाम की सनातन परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक और उत्तरदायी प्रशासन का नया मॉडल प्रस्तुत करे। यदि उत्तराखंड इस संतुलन को स्थापित कर पाता है, तो वह केवल एक प्रबंधन प्रणाली नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थाओं के सुशासन का ऐसा आदर्श प्रस्तुत करेगा, जिसे पूरे देश में अनुकरणीय माना जाएगा। Post navigation लिपुलेख से फिर शुरू होता भारत-तिब्बत व्यापार सीमांत अर्थव्यवस्था के लिए नई उम्मीद