गोदावरी घाटी के पर्मियन कालीन तलछटों में मिले प्राचीन वनाग्नि के प्रमाण, जलवायु और कोयला निर्माण पर पड़े प्रभाव का खुलासा

लखनऊ/देहरादून। लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले प्राचीन गोंडवाना भूभाग के जंगलों में फैली भीषण आग के ठोस आणविक साक्ष्य भारतीय वैज्ञानिकों को मिले हैं। यह खोज पृथ्वी की प्राचीन जलवायु, वनस्पति और कोयला निर्माण की प्रक्रियाओं को समझने में अहम साबित हो सकती है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान Birbal Sahni Institute of Palaeosciences (बीएसआईपी) के शोधकर्ताओं ने गोदावरी घाटी के गोंडवाना कोयला क्षेत्रों में पर्मियन कालीन तलछटों का अध्ययन कर यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला है। शोध में यह स्पष्ट हुआ कि उस दौर में व्यापक स्तर पर वनाग्नि की घटनाएं हुई थीं, जिनका प्रभाव पृथ्वी की पारिस्थितिकी और जलवायु पर पड़ा।

शोधकर्ताओं ने बताया कि पहले के अधिकांश अध्ययन केवल सूक्ष्मदर्शी अवलोकनों पर आधारित थे, जिससे चारकोल कणों की वास्तविक उत्पत्ति और प्रकृति को लेकर अस्पष्टता बनी रहती थी। इस चुनौती को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने पहली बार पैलिनोफेसिस विश्लेषण, रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी और एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी आधुनिक आणविक तकनीकों का संयुक्त उपयोग किया।

अध्ययन में प्राचीन अग्नि से उत्पन्न सूक्ष्म चारकोल कणों की उच्च-तीव्रता और निम्न-तीव्रता वाली श्रेणियों की पहचान की गई। वैज्ञानिकों ने इनके आकार, संरक्षण स्थिति और प्रकाशीय गुणों के आधार पर दोनों के बीच अंतर स्थापित किया।

शोध दल में शामिल वैज्ञानिक नेहा अग्रवाल, Shivli Srivastava और Rancy Paul Mathews ने बताया कि यह अध्ययन प्राचीन वनाग्नि व्यवस्थाओं को समझने की दिशा में बड़ी उपलब्धि है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आग की घटनाओं ने पर्मियन काल में वनस्पतियों और कार्बनिक पदार्थों के विकास को प्रभावित किया।

शोध के दौरान दहन से जुड़े आणविक संकेतों, पॉली एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) और तापीय परिवर्तन के रासायनिक संकेतों का भी विश्लेषण किया गया। परागकण संबंधी आंकड़ों और स्पेक्ट्रोस्कोपिक परिणामों के संयोजन से वैज्ञानिकों को आग से उत्पन्न कार्बनिक पदार्थों की अधिक सटीक पहचान करने में सफलता मिली।

Wiley के Geological Journal में प्रकाशित यह शोध भविष्य में दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन के अधिक सटीक मॉडल तैयार करने में सहायक माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे भविष्य में जलवायु परिवर्तन और जंगलों में लगने वाली चरम आग जैसी घटनाओं के प्रभावों का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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