उत्तराखंड में वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने जंगलों में जल संरक्षण और आग नियंत्रण के लिए नई पहल शुरू की है। इसके तहत वन पंचायत स्तर पर चाल-खाल और वाटर होल विकसित किए जा रहे हैं, ताकि जंगलों में नमी बनी रहे और गर्मियों में वन्यजीवों को पानी उपलब्ध हो सके। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को वनाग्नि रोकथाम के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाने और पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के निर्देश दिए हैं। प्रदेश की 11,217 वन पंचायतों में ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां जल की कमी अधिक है। चयन के बाद बजट जारी कर निर्माण कार्य किया जाएगा। इस पहल से वनाग्नि में कमी, जल संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष में राहत मिलने की उम्मीद है। देहरादून। उत्तराखंड में हर वर्ष गर्मियों के दौरान वनाग्नि एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण समस्या बनकर सामने आती है। जंगलों में लगने वाली आग न केवल बहुमूल्य वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाती है, बल्कि वन्यजीवों, पर्यावरणीय संतुलन और समग्र पारिस्थितिकी तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। वनाग्नि की घटनाओं के दौरान सबसे बड़ी समस्या जल स्रोतों की कमी और आग बुझाने के लिए आवश्यक संसाधनों का अभाव होती है। इसी समस्या के स्थायी समाधान के लिए राज्य सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। इसके तहत वन पंचायत स्तर पर जंगलों के भीतर चाल-खाल और वाटर होल विकसित करने की योजना पर तेजी से कार्य किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य जंगलों में नमी बनाए रखना, वनाग्नि की घटनाओं को कम करना तथा गर्मियों के दौरान वन्यजीवों को पर्याप्त जल उपलब्ध कराना है। इस संबंध में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की थी। बैठक में उन्होंने वनाग्नि नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी रणनीति तैयार करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने और वन क्षेत्रों के आसपास जल संरचनाएं विकसित करने पर बल दिया। उनका कहना था कि जंगलों में वर्षभर नमी बनी रहने से आग फैलने की संभावना स्वतः ही कम हो जाती है। मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद प्रदेश की वन पंचायतों को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने का कार्य सौंपा गया है, जहां जल संकट अधिक रहता है और जहां छोटे जलस्रोत विकसित किए जा सकते हैं। चयनित स्थलों की रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी, जिसके आधार पर आवश्यक बजट स्वीकृत कर निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाएगा। प्रदेश में वर्तमान में लगभग 11,217 वन पंचायतें सक्रिय हैं। इनमें कई क्षेत्रों में पारंपरिक जल स्रोत मौजूद हैं, जबकि बड़ी संख्या में ऐसे इलाके भी हैं जहां गर्मियों में गंभीर जल संकट उत्पन्न हो जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान वृद्धि और वर्षा में कमी के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे वन्यजीव पानी की तलाश में मानव बस्तियों की ओर आने लगते हैं और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ जाती हैं। वन विभाग के अनुसार जंगलों में वाटर होल और चाल-खाल विकसित किए जाने से एक साथ कई समस्याओं का समाधान संभव होगा। इससे न केवल जंगलों की मिट्टी में नमी बनी रहेगी, बल्कि सूखी घास और पत्तियों में आग फैलने की संभावना भी कम होगी। साथ ही आग लगने की स्थिति में स्थानीय स्तर पर पानी उपलब्ध होने से वनकर्मियों को राहत मिलेगी और आग बुझाने में सहायता मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल केवल वनाग्नि नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण और जल संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। जंगलों में पर्याप्त जल उपलब्ध होने से वन्यजीवों का रिहायशी क्षेत्रों की ओर पलायन कम होगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष में भी कमी आएगी। इसके अतिरिक्त कृषि फसलों को होने वाले नुकसान पर भी नियंत्रण संभव होगा। पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से चाल-खाल जैसी जल संरक्षण प्रणालियां ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। ग्रामीण समुदाय वर्षा जल के संरक्षण हेतु छोटे गड्ढों और संरचनाओं का निर्माण करते थे, जिससे भूमि में नमी लंबे समय तक बनी रहती थी। समय के साथ इन परंपरागत व्यवस्थाओं की उपेक्षा हुई, लेकिन अब राज्य सरकार और वन पंचायतें इन्हें पुनर्जीवित करने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। इस पूरी योजना में स्थानीय समुदायों और वन पंचायतों की भागीदारी को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वे अपने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और जल संसाधनों की बेहतर समझ रखते हैं। इससे न केवल सही स्थानों का चयन संभव होगा, बल्कि इन संरचनाओं के संरक्षण और रखरखाव में भी सहायता मिलेगी। फिलहाल प्रदेशभर में संभावित स्थलों की पहचान का कार्य तेज गति से चल रहा है। चयन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाएगा। सरकार को विश्वास है कि यह पहल भविष्य में वनाग्नि की घटनाओं में कमी लाने, जल संरक्षण को बढ़ावा देने तथा वन्यजीव सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, साथ ही पर्यावरणीय संतुलन और पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती प्रदान करेगी। Post navigation आईएमए की पासिंग आउट परेड बनेगी ऐतिहासिक, पहली बार पुरुष कैडेटों के साथ कदमताल करेंगी महिला कैडेट देहरादून में सनसनी: जौलीग्रांट एयरपोर्ट के स्टेट गेस्ट हाउस में तैनात हेड कांस्टेबल की संदिग्ध मौत, 11 राउंड फायरिंग से मचा हड़कंप