उत्तराखंड आज देश के सबसे तेजी से विकसित हो रहे पर्यटन राज्यों में शामिल है। धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन, इको-टूरिज्म और सीमांत क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटन गतिविधियों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहिब, नैनीताल, मसूरी, औली, चोपता, मुनस्यारी, आदि कैलाश और ओम पर्वत जैसे गंतव्यों पर हर वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं। पर्यटन से रोजगार, व्यापार और स्थानीय आय में वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों पर बढ़ता मानव और वाहन दबाव अब एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आ रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। चारधाम यात्रा में ही प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यात्रा सीजन के दौरान ऋषिकेश, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, सोनप्रयाग, जोशीमठ और अन्य प्रमुख पड़ावों पर कई-कई किलोमीटर लंबा जाम लगना आम बात हो गई है। सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान नैनीताल, मसूरी और भीमताल जैसे पर्यटन स्थलों की स्थिति भी इससे अलग नहीं रहती। कई बार पर्यटकों को कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में घंटों का समय लग जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल बढ़ती पर्यटक संख्या नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक गंभीर विषय यह है कि उत्तराखंड के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों की “कैरींग कैपेसिटी” या “बेयरिंग कैपेसिटी” का वैज्ञानिक आकलन किए बिना पर्यटन को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। कैरींग कैपेसिटी का अर्थ है किसी क्षेत्र की वह अधिकतम क्षमता, जिसके भीतर वह अपनी भौगोलिक, पर्यावरणीय और आधारभूत संरचना की सीमाओं को प्रभावित किए बिना लोगों और गतिविधियों का दबाव सहन कर सके। इसमें सड़क क्षमता, जल उपलब्धता, पार्किंग व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, स्वास्थ्य सुविधाएं, आपदा प्रबंधन तंत्र और पर्यावरणीय संवेदनशीलता जैसे अनेक कारक शामिल होते हैं

 क्या है “बेयरिंग कैपेसिटी” या “कैरींग कैपेसिटी”?

किसी क्षेत्र की कैरींग कैपेसिटी (Carrying Capacity) का अर्थ है कि वह क्षेत्र अपनी भौगोलिक, पर्यावरणीय और आधारभूत संरचना की क्षमता के अनुसार अधिकतम कितने लोगों, वाहनों या गतिविधियों का दबाव सुरक्षित रूप से सहन कर सकता है।
कैरींग कैपेसिटी का आकलन  सड़क एवं परिवहन क्षमता,
जल उपलब्धता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, पार्किंग क्षमता, पर्यावरणीय संवेदनशीलता, आपदा जोखिम, स्वास्थ्य एवं आपातकालीन सेवाएं, स्थानीय आबादी पर प्रभाव के आधारों पर किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के अधिकांश पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर वर्तमान में उनकी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक पर्यटक पहुंच रहे हैं।

सड़क दुर्घटनाएं उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चिंता बन चुकी हैं। राज्य में लगभग हर सप्ताह किसी न किसी जिले से वाहन के गहरी खाई में गिरने या सड़क से फिसलने की खबर सामने आती है। कई मामलों में एक ही दुर्घटना में अनेक लोगों की जान चली जाती है। खराब मौसम, संकरी सड़कें, चालक की थकान, ओवरलोडिंग और अत्यधिक यातायात इसके प्रमुख कारण हैं। पर्यटन के बढ़ते दबाव ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक है। हिमालय विश्व के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां बड़ी संख्या में पर्यटकों के पहुंचने से प्लास्टिक कचरे में वृद्धि, जल स्रोतों पर दबाव, वनों पर प्रभाव और जैव विविधता को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। कई लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर कूड़ा निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण स्थानीय पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। नैनीताल और अन्य झील क्षेत्रों में बढ़ता मानव दबाव जल गुणवत्ता के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है।

प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से भी उत्तराखंड अत्यंत संवेदनशील राज्य है। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की ऋषिगंगा त्रासदी, जोशीमठ भू-धंसाव और हाल के वर्षों में बादल फटने तथा भूस्खलन की अनेक घटनाएं यह संकेत देती हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास और पर्यटन गतिविधियों को अत्यंत सावधानी के साथ संचालित करने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है, जिससे सड़कें बाधित होती हैं और हजारों यात्री प्रभावित होते हैं। ऐसे समय में यदि किसी क्षेत्र में उसकी क्षमता से अधिक लोग मौजूद हों तो राहत और बचाव कार्य भी कठिन हो जाते हैं।

राज्य सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए कई प्रयास किए हैं। चारधाम यात्रा के लिए पंजीकरण व्यवस्था लागू की गई है, विभिन्न मार्गों पर पार्किंग स्थलों का निर्माण किया जा रहा है, रोपवे परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है और वैकल्पिक पर्यटन स्थलों को विकसित करने की योजना पर काम हो रहा है। सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देकर दबाव को विभाजित करने का प्रयास भी किया जा रहा है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पर्यटन प्रबंधन को कैरींग कैपेसिटी आधारित नहीं बनाया जाएगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।

वास्तव में आवश्यकता इस बात की है कि राज्य के प्रत्येक प्रमुख पर्यटन स्थल और तीर्थधाम का वैज्ञानिक अध्ययन कर उसकी अधिकतम दैनिक क्षमता निर्धारित की जाए। सड़कों, पार्किंग स्थलों और स्थानीय संसाधनों की क्षमता के अनुसार ही पर्यटकों को प्रवेश की अनुमति दी जाए। कई देशों और भारत के कुछ संवेदनशील पर्यटन स्थलों पर इसी मॉडल को अपनाया गया है, जहां ऑनलाइन बुकिंग और पूर्व अनुमति के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता है।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि चारधाम यात्रा, नैनीताल, मसूरी, औली और अन्य लोकप्रिय स्थलों के लिए दैनिक पर्यटक सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। निजी वाहनों की संख्या सीमित कर सार्वजनिक परिवहन और शटल सेवाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। पार्किंग क्षमता से अधिक वाहनों को पर्वतीय नगरों में प्रवेश न दिया जाए। साथ ही आपदा जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों और होटल विस्तार पर भी सख्त निगरानी आवश्यक है।

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए पर्यटन अनिवार्य है, लेकिन पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। यदि राज्य सरकार और नीति निर्माता समय रहते कैरींग कैपेसिटी आधारित पर्यटन नीति लागू नहीं करते हैं, तो आने वाले वर्षों में बढ़ता यातायात दबाव, सड़क दुर्घटनाएं, पर्यावरणीय क्षति और प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम और अधिक गंभीर रूप ले सकता है। हिमालय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए अब विकास का मॉडल केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि सुरक्षित, नियंत्रित और सतत पर्यटन पर आधारित होना चाहिए। यही उत्तराखंड के पर्यावरण, स्थानीय समुदायों और आने वाली पीढ़ियों के हित में होगा।

By उत्तराखंड संवाद भारती

उत्तराखंड संवाद भारती एक हिंदी समाचार पोर्टल है, जो उत्तराखंड सहित देश-दुनिया की ताज़ा, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *