डॉ कमल किशोर डुकलान ‘सरल’


उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय,और नदियों के देवस्थलों से ही नहीं है,इसकी यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रति गौरव से है। उत्तराखंड का पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का मूल्यांकन, सामाजिक, व्यक्तिगत और प्रकृति के साथ सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। लोकपर्वों में हरेला उत्तराखंड का सांस्कृतिक अनूठापन, मित्रता और लोकजीवन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।

‘हरेला’ का अर्थ है हरियाली, नवजीवन और समृद्धि से है। परंपरागत रूप से हरेला पर्व कुमाऊं आंचल में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक हरेला पर्व आज पूरे उत्तराखंड की अपनी सांस्कृतिक पहचान बन गया है। वर्षा ऋतु का आगमन, कृषि चक्र का बुवाई और प्रकृति की प्रति कृतज्ञता और यह पर्व हमें अपने वन्यजीवों से जोड़ता है।

हरेला के साथ अनेक लोकमान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं। प्रकृति संरक्षण का प्रतीक हरेला पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पूर्ण मिलन और सृष्टि में हरियाली और उर्वरता के विस्तार का प्रतीक माना जाता है। भारतीय समाज कृषि प्रधान है। कृषि प्रधान समाज में इसे नए फ़सल और नए जीवन चक्र की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। हरेला से नौ या दस दिन पूर्व घर में मिट्टी से भरे अवशेष में गेहूँ, जौ, मक्का या धान के बीज बोए जाते हैं। पर्व के दिन पौध रुप में हरियाली को परिवार के सभी बड़े सदस्य छोटे समूहों के प्रमुखों को उनके सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि प्रकृति और परिवार दोनों की प्रति आस्था का प्रतीक है।

उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन में जल,जंगल,और जमीन केवल संसाधन नहीं हैं, बल्कि यह यहां की संस्कृति, ज़मीन और सभ्यता का आधार हैं। यही कारण है कि हरेला हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी,तो तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। हरेला के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामूहिक कार्यक्रम उत्तराखंडी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की शुरुआत है जो कि सामाजिक एकता से भी तोड़ते हैं।

आज हमें जब विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन,प्राकृतिक संरचनाओं के संरक्षण और प्रकृति के संरक्षण जैसे गंभीर दृश्यों का सामना किया जा रहा है, ऐसे में प्रकृति संरक्षण के हरेला का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस लोकपर्व में समय के साथ स्वयं को केवल एक सांस्कृतिक परंपरा तक सीमित नहीं रखा जा सकता है, बल्कि जनभागीदारी आधारित पर्यावरण संरक्षण के एक प्रभावशाली अभियान का स्वरूप बनाया जा सकता है।

आज हरेला पर्व उत्तराखंड ही नहीं तो पूरे भारत वर्ष में प्रकृति संरक्षण के जनआंदोलन का रूप में हरित क्रांति में आगे बढ़ चुका है। प्रत्येक वर्ष पर्यावरण संरक्षण के लिए देशभर में वृक्षारोपण के रूप में व्यापक विशिष्टता के अभियान चलाये जा रहे हैं, जिनमें शामिल समुदाय, छात्र, स्वयंसेवी संगठन, महिला समूह, युवा, सरकारी विभाग और आम नागरिक अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहा है। यह प्रयास केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ना है, ताकि आने वाली संपत्ति को एक हित, शांति और सुरक्षित मिल सके। हरेला पर्व केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता, लोकआस्था और मौलिक व्यक्तिगत पर्व का सिद्धांत है। हमारी सरकार लोक संस्कृति के संरक्षण, पारंपरिक त्योहारों के महत्व और पर्यावरण संरक्षण को समान रूप से प्राथमिकता देने का निरंतर कार्य कर रही है।

हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा का उत्सव है। प्रकृति संरक्षण के प्रतीक हरेला पर्व न हमें सिखाया है कि विकास और प्रकृति एक साथ चल सकते हैं। हमारी संस्कृति हमें प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसका संरक्षण करना सिखाती है। यही भारत की सनातन परंपरा है और यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति भी।

आइए, इस हरेला में हम सभी एक पौधारोपण करें, उसकी देखभाल करें और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें। यही हमारी संस्कृति के प्रति सच्ची श्रद्धा और आने वाली परंपरा के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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