भारत आज जिस सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है, वह केवल जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तनाव या आर्थिक चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि पानी की तेजी से घटती उपलब्धता है। देश में बढ़ती आबादी, अनियोजित शहरीकरण, भूजल का अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी से प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में देश के करोड़ों लोगों को पेयजल की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

नीति आयोग और विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार भारत के लगभग 60 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रह रहे हैं जहां पानी की उपलब्धता बेहद सीमित होती जा रही है। यही नहीं, वर्ष 2050 तक देश के 50 प्रतिशत से अधिक जिलों में गंभीर जल संकट की स्थिति उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है। इस संकट का प्रभाव केवल लोगों की दैनिक जरूरतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य और देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा।

दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी, लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत ताजे जल संसाधन

भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल है। दुनिया की करीब 17 प्रतिशत आबादी भारत में निवास करती है, जबकि देश के पास वैश्विक ताजे जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध है। हर वर्ष मानसून और अन्य स्रोतों से देश को लगभग 4,000 घन किलोमीटर पानी प्राप्त होता है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा या तो समुद्र में बह जाता है या प्रभावी जल संरक्षण के अभाव में उपयोग से पहले ही नष्ट हो जाता है।

जल संसाधनों का वितरण भी देश में समान नहीं है। देश के लगभग 36 प्रतिशत भूभाग में 71 प्रतिशत जल संसाधन उपलब्ध हैं, जबकि शेष 64 प्रतिशत क्षेत्र को केवल 29 प्रतिशत जल संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही असमानता कई राज्यों और क्षेत्रों में पानी की किल्लत को बढ़ावा देती है।

दक्षिण एशिया बना जल संकट का सबसे बड़ा केंद्र

विश्व संसाधन संस्थान (WRI) की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे अधिक जल तनाव वाले क्षेत्रों में शामिल हो चुका है। यहां की लगभग 74 प्रतिशत आबादी जल संकट से प्रभावित है। दुनिया के कई देश जैसे बहरीन, कुवैत, कतर, साइप्रस, लेबनान और ओमान पहले से ही गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं।

इन देशों में उपलब्ध जल संसाधनों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि, उद्योग और घरेलू जरूरतों में खर्च हो जाता है। ऐसे में थोड़ी सी वर्षा की कमी या सूखे की स्थिति भी बड़े संकट का कारण बन जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी इसी दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।

भारत में जल संकट के पीछे क्या हैं प्रमुख कारण?

भारत में जल संकट एक दिन में पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे कई वर्षों से विकसित हो रही समस्याएं जिम्मेदार हैं।

सबसे बड़ा कारण तेजी से बढ़ती आबादी है। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे पानी की मांग भी बढ़ रही है। इसके अलावा शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। कई शहरों में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमिगत जल का लगातार दोहन किया जा रहा है, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन भी इस संकट को बढ़ा रहा है। मौसम के बदलते स्वरूप के कारण बारिश का पैटर्न अस्थिर हो गया है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन की अपर्याप्त व्यवस्था, जल स्रोतों का प्रदूषण और जल प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था भी संकट को गहरा कर रही है।

प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में लगातार गिरावट

भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पिछले दो दशकों में तेजी से घटी है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,820 घन मीटर थी। वर्तमान में यह घटकर लगभग 1,400 से 1,486 घन मीटर के बीच रह गई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यदि किसी देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,700 घन मीटर से कम हो जाती है तो उसे जल तनाव की श्रेणी में माना जाता है। वहीं 1,000 घन मीटर से कम उपलब्धता वाले देशों को जल-अभावग्रस्त माना जाता है।

अनुमानों के अनुसार वर्ष 2031 तक भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1,367 घन मीटर और 2050 तक लगभग 1,140 घन मीटर रह सकती है। यह स्थिति भविष्य में गंभीर जल संकट की ओर संकेत करती है।

‘डे जीरो’ का खतरा बढ़ रहा

‘डे जीरो’ वह स्थिति होती है जब किसी शहर के पास लोगों को उपलब्ध कराने के लिए पीने योग्य पानी लगभग समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में प्रशासन को पानी की आपूर्ति सीमित करनी पड़ती है और नागरिकों को निर्धारित मात्रा में पानी दिया जाता है।

भारत में चेन्नई वर्ष 2019 में इस तरह की स्थिति का सामना कर चुका है। उस समय शहर के प्रमुख जलाशय लगभग सूख गए थे और लाखों लोगों को पानी की भारी किल्लत झेलनी पड़ी थी।

नीति आयोग पहले ही चेतावनी दे चुका है कि दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई सहित देश के कई बड़े शहरों में भूजल भंडार तेजी से समाप्त हो रहे हैं। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में अन्य शहर भी डे जीरो की स्थिति तक पहुंच सकते हैं।

खेती में होती है सबसे अधिक पानी की खपत

भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है और यही क्षेत्र सबसे अधिक पानी की खपत भी करता है। देश में कुल जल उपयोग का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में खर्च होता है।

भूजल उपयोग के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में निकाले जाने वाले कुल भूजल का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई कार्यों में उपयोग होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो पानी की खपत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

दूषित पानी बन रहा मौत का कारण

जल संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी की गुणवत्ता भी एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। नीति आयोग के अनुसार भारत का लगभग 70 प्रतिशत पानी किसी न किसी स्तर पर प्रदूषित है।

दूषित पानी के कारण हर वर्ष लाखों लोग डायरिया, हैजा, टाइफाइड और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों की चपेट में आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल लगभग 2 लाख लोगों की मौत दूषित और अपर्याप्त पेयजल के कारण हो जाती है।

हाल के वर्षों में कई राज्यों में दूषित पेयजल के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकारों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

क्या AI और डेटा सेंटर बढ़ा रहे हैं जल संकट?

तकनीकी विकास के इस दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटरों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, इन तकनीकों के संचालन के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।

डेटा सेंटरों में लगे सर्वरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि भविष्य में क्लोज्ड-लूप कूलिंग जैसी तकनीकों को अनिवार्य नहीं किया गया तो डेटा सेंटर स्थानीय जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

जल संकट से GDP को 6 प्रतिशत तक नुकसान का खतरा

जल संकट का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है। कृषि उत्पादन में गिरावट, उद्योगों में उत्पादन लागत बढ़ना, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता बोझ और श्रम उत्पादकता में कमी जैसी समस्याएं आर्थिक विकास को प्रभावित करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार यदि जल संकट पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो वर्ष 2050 तक भारत की GDP को लगभग 6 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है। वहीं वैश्विक स्तर पर यह नुकसान 8 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

समाधान की दिशा में क्या करने की जरूरत?

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट को पूरी तरह रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन प्रभावी प्रबंधन के जरिए इसके दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इसके लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, भूजल पुनर्भरण परियोजनाओं को मजबूत करना, जल प्रदूषण पर सख्त नियंत्रण, आधुनिक सिंचाई तकनीकों का विस्तार, जल पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना और लोगों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है।

भारत का भविष्य काफी हद तक उसके जल संसाधनों के प्रबंधन पर निर्भर करेगा। बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और सीमित जल संसाधनों के बीच संतुलन बनाए रखना आने वाले दशकों की सबसे बड़ी चुनौती होगी। यदि अभी से प्रभावी और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए तो जल संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रहेगा, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन जाएगा। जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देकर ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जल भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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