देहरादून। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा विभिन्न आयोगों, निगमों, परिषदों और समितियों में 100 से अधिक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को दायित्व सौंपे जाने के बाद प्रदेश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। सरकार जहां इन नियुक्तियों को संगठन और शासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक बता रही है, वहीं विपक्ष इसे आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक संतुलन साधने और कार्यकर्ताओं को साधने की कवायद करार दे रहा है। हाल ही में सरकार द्वारा तीन दिनों के भीतर बड़ी संख्या में दायित्वों की घोषणा की गई। इसके बाद नियुक्तियों की संख्या और उन पर होने वाले सरकारी खर्च को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्ष का कहना है कि चुनाव से पहले इतने बड़े स्तर पर दायित्व बांटना राजनीतिक संदेश देने का प्रयास है, जबकि सत्ता पक्ष का दावा है कि इन नियुक्तियों से प्रशासनिक कार्यों में गति आएगी और विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी लोगों की विशेषज्ञता का लाभ राज्य को मिलेगा। आखिर क्या होते हैं दायित्वधारी? राज्य सरकार विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े आयोगों, परिषदों, निगमों और समितियों में गैर-सरकारी व्यक्तियों को अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य या सलाहकार के रूप में नियुक्त करती है। इनका उद्देश्य संबंधित क्षेत्र की समस्याओं, सुझावों और योजनाओं को सरकार तक पहुंचाना तथा विभागीय कार्यों की निगरानी और सुझाव देना होता है। सरकार का दावा है कि इन पदों पर अनुभवी सामाजिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व रखने वाले लोगों को जिम्मेदारी देने से प्रशासन और जनता के बीच संवाद मजबूत होता है। साथ ही विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में भी सहयोग मिलता है। दायित्वधारियों को मिलती हैं कई सुविधाएं दायित्व प्राप्त व्यक्तियों को राज्य सरकार की ओर से विभिन्न प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इनमें मानदेय, वाहन सुविधा, कार्यालय संचालन के लिए सहायता, स्टाफ तथा अन्य प्रशासनिक सुविधाएं शामिल हैं। उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार एक दायित्वधारी को लगभग 45 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। इसके अतिरिक्त वाहन संचालन एवं आवागमन पर लगभग 80 हजार रुपये प्रतिमाह तक का खर्च सरकार वहन करती है। यदि संबंधित संस्था के पास कार्यालय उपलब्ध नहीं है तो कार्यालय संचालन के लिए लगभग 25 हजार रुपये प्रतिमाह तक का अतिरिक्त भत्ता भी दिया जा सकता है। इसके अलावा सरकारी नियमों के तहत अन्य सुविधाएं और भत्ते भी उपलब्ध कराए जाते हैं। इसी आधार पर विपक्ष सरकार पर सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ाने का आरोप लगा रहा है। सरकार का पक्ष: योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में मिलेगी मदद सरकार और भाजपा नेताओं का कहना है कि विभिन्न आयोगों, परिषदों और समितियों में नियुक्त किए गए लोगों के पास सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव है। ऐसे लोगों को जिम्मेदारी देने से शासन और संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा। साथ ही जनता की समस्याओं और सुझावों को सरकार तक पहुंचाने में भी सहायता मिलेगी। सरकार का मानना है कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और अनुभवी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी मिलने से योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा। कांग्रेस ने बताया ‘चुनावी रेवड़ी’ कांग्रेस ने इन नियुक्तियों को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता आमेंद्र बिष्ट ने कहा कि दायित्वों का यह वितरण जनहित से अधिक राजनीतिक हितों को साधने का प्रयास प्रतीत होता है। उनका कहना है कि चुनावी वर्ष में अचानक इतनी बड़ी संख्या में दायित्व बांटना यह दर्शाता है कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच संतुलन बनाने तथा संभावित असंतोष को कम करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का आरोप है कि जिन लोगों को दायित्व दिए गए हैं उनमें कई ऐसे नेता भी शामिल हैं जो अन्य राजनीतिक दलों, विशेषकर कांग्रेस, से भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे मूल कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है। चुनावी वर्ष में बढ़ी राजनीतिक चर्चा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले किए गए इस प्रकार के दायित्व वितरण का राजनीतिक महत्व भी है। एक ओर इससे पार्टी संगठन को सक्रिय करने का संदेश जाता है तो दूसरी ओर सरकार अपने समर्थक वर्ग को भी संतुष्ट करने का प्रयास करती है। हालांकि यह भी तथ्य है कि आयोगों, परिषदों और निगमों में नियुक्तियां किसी भी सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा होती हैं। ऐसे में इन नियुक्तियों का वास्तविक प्रभाव उनके कार्यों और जनता को मिलने वाले लाभ के आधार पर ही आंका जा सकेगा। फिलहाल उत्तराखंड में 100 से अधिक दायित्वधारियों की नियुक्ति ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह मुद्दा सरकार की प्रशासनिक प्राथमिकताओं और चुनावी रणनीति दोनों के संदर्भ में चर्चा का विषय बना रह सकता है। Post navigation प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्ष के कार्यकाल का जश्न मनाएगी उत्तराखंड सरकार, 12 से 14 जून तक राज्यभर में होंगे विशेष कार्यक्रम उत्तराखंड में गर्मी का प्रकोप बरकरार, मैदानी इलाकों में 40 डिग्री के पार पहुंचा पारा; पहाड़ों में बारिश से राहत