सुभाष चन्द्र जोशी देहरादून में अभी हुए नकली दवा निर्माण फैक्ट्री का भंडाफोड़ केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे तंत्र की कमजोरियों और नियामक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। जो दवा रोगी के जीवन को बचाने का माध्यम है, यदि वही दवा नकली निकले तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराध है। उत्तराखंड आज देश के प्रमुख फार्मास्यूटिकल उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में सैकड़ों दवा बनाने वाली इकाइयाँ हैं। हालिया कार्रवाई से यह भी स्पष्ट हुआ है कि यह नेटवर्क केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं, बल्कि इसके तार देश के अन्य राज्यों तक फैले हो सकते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी फैक्ट्रियाँ महीनों या वर्षों तक कैसे संचालित होती रहती हैं? क्या निरीक्षण प्रणाली इतनी कमजोर है कि अवैध उत्पादन की भनक तक नहीं लगती? यदि औषधि नियंत्रण विभाग नियमित निरीक्षण करता है तो फिर ऐसी इकाइयाँ पकड़ में आने से पहले इतनी बड़ी मात्रा में दवाएँ बाजार तक कैसे पहुँचा देती हैं? यह सवाल केवल प्रशासन से नहीं, बल्कि पूरे नियामक ढाँचे से है। यह भी स्वीकार करना होगा कि सरकार समय-समय पर छापेमारी करती है, लाइसेंस निलंबित करती है और दोषियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करती है। लेकिन केवल कार्रवाई की खबरें आने से समस्या समाप्त नहीं होती। यदि हर कुछ महीनों बाद नया गिरोह पकड़ा जा रहा है, तो इसका अर्थ है कि अपराधियों में कानून का भय पर्याप्त नहीं है। कहीं न कहीं निगरानी, समन्वय या जवाबदेही में कमी अवश्य है। यदि भ्रष्टाचार की भूमिका है तो उस पर भी कठोर कार्रवाई आवश्यक है। नकली दवाओं का दुष्प्रभाव केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। इससे डॉक्टर की साख प्रभावित होती है, अस्पतालों पर अविश्वास बढ़ता है और सबसे गंभीर बात यह कि मरीज का जीवन खतरे में पड़ जाता है। कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह और संक्रमण जैसी गंभीर बीमारियों में यदि नकली दवा पहुँच जाए तो परिणाम घातक हो सकते हैं। यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जीवन से खिलवाड़ है। समाधान केवल छापेमारी नहीं, बल्कि पूरी दवा आपूर्ति श्रृंखला की पारदर्शी निगरानी है। हर दवा की डिजिटल ट्रैकिंग, राज्यों के बीच सूचना साझा करने की मजबूत व्यवस्था, औषधि निरीक्षकों की संख्या में वृद्धि, आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार और दोषियों को त्वरित एवं कठोर दंड—ये सभी कदम समान रूप से आवश्यक हैं। साथ ही जनता को भी जागरूक होना होगा कि दवाएँ केवल अधिकृत मेडिकल स्टोर से ही खरीदें और संदिग्ध दवाओं की सूचना तुरंत संबंधित विभाग को दें। देहरादून की हालिया घटना एक चेतावनी है। यदि आज भी व्यवस्था नहीं चेती तो नकली दवाओं का यह कारोबार केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का राष्ट्रीय संकट बन सकता है। सरकार, प्रशासन, दवा उद्योग और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि मरीज के विश्वास को टूटने न दिया जाए। क्योंकि जब दवा ही भरोसेमंद न रहे, तब चिकित्सा व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव भी कमजोर पड़ जाती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक विषयों के विश्लेषक हैं।) Post navigation आंदोलन, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं का भविष्य