✍️ डॉ. कमल किशोर डुकलान ‘सरल प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं, छात्र आंदोलनों और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर डॉ. कमल किशोर डुकलान ‘सरल’ ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। लेख में लोकतांत्रिक विरोध, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, सरकार की जवाबदेही और करोड़ों युवाओं के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। शिक्षा और रोजगार किसी भी देश की प्रगति के सबसे मजबूत आधार हैं। प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल चयन की प्रक्रिया नहीं होतीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके परिवारों की उम्मीदों और वर्षों की मेहनत का परिणाम होती हैं। ऐसे में जब प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा स्थगन या अन्य अनियमितताओं की घटनाएँ सामने आती हैं, तो उनका प्रभाव केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है। विगत के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने युवाओं के बीच गहरी चिंता पैदा की है। स्वाभाविक है कि जब मेहनत और प्रतिभा पर संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है, तो छात्र अपनी आवाज़ लोकतांत्रिक तरीके से उठाते हैं। शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र का एक वैध और संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसकी सफलता अनुशासन, संयम और स्पष्ट उद्देश्य पर निर्भर करती है। वर्तमान में ‘आंदोलन’ और ‘युवाओं के भविष्य’ के बीच का संबंध एक गहरे और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। जब परीक्षा प्रणाली, रोजगार के अवसरों और शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगता है, तब युवा सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि कहीं न कहीं व्यवस्था युवाओं की मेहनत के साथ न्याय करने में विफल हो रही है। लोकतन्त्र में आंदोलन अपनी मांगों को मनवाने का एक संवैधानिक अधिकार है, आन्दोलनों की सबसे बड़ी शक्ति उसका शांतिपूर्ण और अनुशासित स्वरूप में होता है। जब किसी आंदोलन में हिंसा, पथराव और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं होने लगती हैं, तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। संसद मार्च के दौरान जंतर-मंतर पर हुई पत्थरबाज़ी में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी वाहनों को क्षति पहुंची। ऐसे घटनाक्रम उन वास्तविक और मासूम आवाजों को भी दबा देते हैं, जो अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से संघर्ष कर रही होती हैं। पिछले बीस दिन पूर्व यह आंदोलन मूलतः नीट और अन्य विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक के विरोध से शुरू हुआ था। बाद में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा सोशल मीडिया पर चलाए गए अभियान और 20 जुलाई के ‘संसद मार्च’ के आह्वान के साथ इसका स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दिया। आंदोलन के दौरान गांधी, अंबेडकर, जय भीम, आजादी जैसे नारों के साथ-साथ “RSS मुर्दाबाद” जैसे राजनीतिक और वैचारिक नारे सुनाई दिए। संसद मार्च के द्वारा राजनैतिक और वैचारिक नारों से यह धारणा बनी कि परीक्षा की शुचिता का मूल मुद्दा धीरे-धीरे पीछे छूटता गया और आंदोलन का केंद्र व्यापक राजनीतिक विमर्श की ओर मुड़ गया। प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक के विरोध में खड़े लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के साथ पूरा देश खड़ा है। लेकिन छात्र केन्द्रित आन्दोलनों में किसी भी प्रकार की हिंसा,उपद्रव या राजनीतिक स्वार्थ का समर्थन किसी भी प्रकार से नहीं किया जाना चाहिए। छात्रों से जुड़े आन्दोलनों में लोकतांत्रिक विरोध और अराजकता के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है। पिछले कुछ दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी यदि आंदोलन को नियंत्रित करने की सरकारी रणनीति थी, तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की भी जिम्मेदारी थी कि वे यह सुनिश्चित करते कि इसमें ऐसे तत्व शामिल न हों, जो इसके मूल उद्देश्य को कमजोर करें। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रतियोगी परीक्षा नीट,यूजीसी-नेट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं पर निश्चित रूप से भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही बनती है। केवल प्रेस के सामने घटनाओं को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं था, दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए थी। इस दृष्टि से यह शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन दोनों की गंभीर विफलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कार्यशैली और प्रशासनिक निर्णयों के लिए जाने जाते हैं। ऐसे संवेदनशील विषय पर समय रहते उच्चस्तरीय बैठक कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए था कि परीक्षाएं समय पर हों, परिणाम समय पर आएं तथा प्रश्नपत्र लीक जैसे मामलों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई हो। इस दिशा में अपेक्षित तत्परता दिखाई नहीं दी। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में CBSE बोर्ड से लेकर JEE, NEET, CUET, UGC-NET, SSC, UPSC, रेलवे, बैंकिंग, राज्य लोक सेवा आयोग तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं केवल मात्र परीक्षाएं नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों के भविष्य का आधार हैं। इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना पूरे शिक्षा तंत्र पर लोगों के विश्वास को कमजोर करता है। भारत में सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष का प्रतिफल मानी जाती है। विशेषकर ग्रामीण, निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह जीवन बदल देने वाला अवसर प्रदान करती हैं। किसी घर में सरकारी नौकरी का नियुक्ति-पत्र आने की खुशी कई बार करोड़ों रुपये मिलने की खुशी से भी अधिक होती है, क्योंकि उसके पीछे परिवार की वर्षों की मेहनत,त्याग और उम्मीदें जुड़ी होती हैं। इसी उम्मीद में अनेक अभिभावक अपनी सीमित आय के बावजूद बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, पुस्तकों, किराये और अन्य आवश्यकताओं पर अपनी सामर्थ्य से अधिक व्यय करते हैं। वे विश्वास करते हैं कि बच्चे की सफलता पूरे परिवार की कठिनाइयों का अंत करेगी। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक केवल एक परीक्षा को प्रभावित नहीं करता, बल्कि वर्षों की मेहनत, विश्वास और आर्थिक त्याग को भी तोड़ देता है। कई परिवार मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरे संकट में पहुँच जाते हैं, और कुछ युवाओं के लिए यह निराशा असहनीय रूप ले लेती है। इन प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए पेपर लीक मामले ने उन हजारों प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्रों को मानसिक,सामाजिक और आर्थिक रुप से गहरे संकट में डालकर सरकारी सिस्टम के प्रति निराशा का भाव पैदा किया है। आज आवश्यकता केवल किसी एक परीक्षा को सफलतापूर्वक आयोजित करने की नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में विश्वास बहाल करने की है। यदि मेहनत करने वाले युवाओं का भरोसा व्यवस्था से उठने लगे, तो इसका प्रभाव केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर भी पड़ेगा। परीक्षाओं की शुचिता, पारदर्शिता और निष्पक्षता केवल विद्यार्थियों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रश्न है। सरकार, शैक्षणिक संस्थाओं, अभिभावकों और समाज—सभी की यह साझा जिम्मेदारी है कि युवाओं की मेहनत को उसका उचित सम्मान मिले और उन्हें ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया जाए, जहाँ सफलता का आधार केवल प्रतिभा, परिश्रम और ईमानदारी हो। Post navigation बद्रीनाथ चोरी और देवस्थानम बोर्ड: परंपरा बनाम पारदर्शिता की बहस