देहरादून (राजकुमार दक्ष)। उत्तराखंड में लैंड जिहाद, लव जिहाद और थूक जिहाद जैसे मुद्दों पर सरकार की सख्त कार्रवाई के बाद अब कथित “नौकरी जिहाद” का मामला सामने आया है। राज्य में 30 साल पहले खत्म हो चुके पदों पर अभी कर्मचारियों के कार्यरत हैं। जिसमें उर्दू अनुवादक-कनिष्ठ लिपिक पद अभी भी अनेक कर्मचारी नौकरी कर रहे हैं। इस संबंध में मुख्यमंत्री को भी शिकायती पत्र भेजकर इन कर्मचारियों की नियुक्तियों की उच्चस्तरीय जांच कराने और इसके जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की मांग की गई है। प्रदेश में भर्ती घोटालों और नियुक्तियों को लेकर पहले भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह नया मामला सरकार और प्रशासन के लिए एक नई चुनौती बन सकता है। इस मामले में शिकायतकर्ता अधिवक्ता विकेश नेगी का आरोप है कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1994-95 में सृजित अस्थायी/अधिसंख्य उर्दू अनुवादक-कनिष्ठ लिपिक पदों की अवधि 28 फरवरी 1996 को समाप्त हो चुकी है, इसके बावजूद कई विभागों में संबंधित कर्मचारी गैरकानूनी तरीके से आज भी कार्यरत हैं। नौकरी खत्म होने के बाद भी उच्चाधिकारियों से मिलीभगत के आधार पर सभी कर्मचारी प्रमोशन लेते रहे और आज भी नौकरी पर बरकरार हैं। उन्होंने कहा कि कथित “नौकरी जिहाद” जैसे गंभीर आरोपों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए ताकि सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। 1996 में समाप्त होनी थी पदों की अवधि मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत में उल्लेख किया गया है कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1994-95 में उर्दू अनुवादक सह कनिष्ठ लिपिक पदों का सृजन किया गया था। शासनादेश संख्या 80 सी०एम०/47-का4-94-10/10/10/94 के अनुसार, जहां नियमित कनिष्ठ लिपिक का पद उपलब्ध नहीं था, वहां अधिसंख्य पद सृजित किए गए थे। इन पदों की वैधता 28 फरवरी 1996 तक अथवा प्रथम रिक्ति होने तक, जो भी पहले हो, निर्धारित की गई थी। इन पदों की वैधानिक अवधि समाप्त होने के बावजूद कुछ कर्मचारी आज भी सरकारी कार्यालयों में कार्यरत हैं। उत्तराखंड गठन से पहले की गई इन नियुक्तियों के कर्मचारी वर्तमान में पुलिस विभाग, जिलाधिकारी कार्यालयों, तहसीलों, विकासखंड कार्यालयों, जिला आबकारी विभाग तथा अन्य सरकारी संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं। आरटीआई दस्तावेजों का हवाला सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त अभिलेखों और सूचनाओं के आधार पर यह मामला सामने आया है। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ कर्मचारियों ने न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त किए थे, लेकिन कई मामलों में स्थगन समाप्त होने के बाद भी सेवाएं जारी रहने की बात सामने आई है। ऐसे मामलों में विभागीय अभिलेखों और सेवा पुस्तिकाओं की जांच आवश्यक है। Post navigation खुशियों भरी यात्रा बनी मातम: उत्तराखंड में दर्दनाक सड़क हादसे में 2 की मौत उत्तराखंड में जिलाधिकारियों को मिला NSA लगाने का अधिकार, 31 अगस्त तक कर सकेंगे कार्रवाई