उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की आस लगाए बैठी कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम राजनीतिक झटके से कम नहीं

✍️ राजकुमार दक्ष

देहरादून । उत्तराखंड को ‘वीरभूमि’ या ‘सैनिक प्रदेश’ कहा जाता है, जहाँ का लगभग हर दूसरा परिवार थल सेना, नौसेना या वायुसेना से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा है। ऐसे में राहुल गांधी का अल्मोड़ा के सिमकनी मैदान में न पहुंचना, केवल सात मिनट का मोबाइल संबोधन देना और दूसरी तरफ पौड़ी दौरे से पहले देहरादून में पूर्व सैनिकों का उग्र विरोध ये सभी कड़ियां आपस में जुड़कर राज्य की सियासत में एक बड़ा नैरेटिव तैयार करती हैं।

जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा रही कि “क्या राहुल गांधी सैनिकों पर दिए अपने विवादित बयानों के विरोध के डर से नहीं आए, और पंतनगर का तकनीकी कारण सिर्फ एक बहाना था?”उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की आस लगाए बैठी कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम किसी राजनीतिक झटके से कम नहीं है।

राजनीति में ‘क्रोनोलॉजी’ और ‘टाइमिंग’ बहुत मायने रखती है। जब एक तरफ राजधानी देहरादून में पूर्व सैनिक सड़कों पर उतरकर पुतला फूंक रहे हैं और पौड़ी व अल्मोड़ा में भारी विरोध की सुगबुगाहट हो, ठीक उसी वक्त राहुल गांधी का ऐन मौके पर मंच पर न पहुंचना भाजपा को हमला करने का मौका दे देता है। कार्यकर्ताओं ने ‘परिवर्तन का शंखनाद’ करने के लिए पूरी ताकत झोंकी थी, लेकिन मुख्य सेनापति के न आने से उनमें मायूसी नजर आई।

पहाड़ में डिजिटल संवाद राजनीतिक रूप से उतना प्रभावी नहीं माना जाता। मीलों दूर से चलकर रैली में आए लोगों के लिए यह अनुभव मिला-जुला और कुछ हद तक निराशाजनक रहा। स्थानीय मुद्दों की पूरी अनदेखी उन सात मिनटों में राहुल गांधी ने अपना पूरा ध्यान प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार पर तीखे हमले करने में लगा दिया, लेकिन वे उत्तराखंड के अपने जलते हुए मुद्दों, जैसे सख्त भू-कानून, मूल निवास, पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर एक शब्द भी नहीं बोले। जनता को लगा कि दिल्ली की लड़ाई लड़ने के लिए उनके मैदान का इस्तेमाल किया गया, उनके अपने दुखों की बात नहीं हुई।

भाजपा इसे “डर कर भागने” और “सैनिकों का सामना न कर पाने” के रूप में प्रचारित कर रही है। राजनीति की पिच पर ‘फुल टॉस’ गेंद जैसा है, जिस पर भाजपा जमकर बाउंड्री मार रही है। भाजपाइयों का कहना है कि राहुल गांधी जानते थे कि सैनिक बहुल इस क्षेत्र में उन्हें काले झंडे दिखाए जा सकते हैं, इसलिए उन्होंने पंतनगर में रुककर फोन से औपचारिकता निभाना ज्यादा सुरक्षित समझा। वहीं कांग्रेस इसे पूरी तरह खराब मौसम, सुरक्षा प्रोटोकॉल या एटीसी की तकनीकी दिक्कतों से जोड़ रही है। हालांकि, राजनीति परसेप्शन (धारणा) का खेल है, और इस वक्त धारणा कांग्रेस के विपरीत जा रही है।

पूर्व सैनिकों और आम जनता में गुस्से की मुख्य वजह राहुल गांधी द्वारा पिछले कुछ समय में ‘अग्निवीर योजना’ और सेना के आंतरिक ढांचे को लेकर दिए गए बयान हैं। अब पौड़ी में आयोजित जनसभा को वर्चुअल रूप से संबोधित करने के दौरान राहुल गांधी ने अग्निवीर योजना को ही समाप्त करने की घोषणा कर दी। इससे कांग्रेस को कितना फायदा होगा, यह तो आने वाले चुनाव में ही पता चल पाएगा।
बिहार के कुटुंबा में एक चुनावी रैली के दौरान राहुल गांधी ने बयान दिया था कि भारतीय सेना पर देश की 10 प्रतिशत आबादी का नियंत्रण है। उनका इशारा सेना में कथित रूप से ऊंची जातियों के दबदबे की ओर था। सेना को जातिगत चश्मे से देखने के इस बयान पर न केवल भाजपा, बल्कि विपक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं और पूर्व सैन्य जनरलों ने भी तीखी आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि भारतीय सेना की एकमात्र जाति ‘देशभक्ति, साहस और बलिदान’ है, इसे जातिगत राजनीति में नहीं घसीटा जाना चाहिए। भाजपा इस मुद्दे को भुनाकर वोटरों को यह समझाने में लगी है कि कांग्रेस केवल सैनिकों के नाम पर राजनीति करती है, उनके प्रति सम्मान नहीं रखती।

सैनिक प्रदेश उत्तराखंड के पारंपरिक सैन्य परिवारों और पूर्व सैनिकों ने इसे भारतीय सेना की गरिमा और सैनिकों के मनोबल पर चोट के रूप में देखा। इसी गुस्से का नतीजा देहरादून में हुए पुतला दहन के रूप में दिखा।

बरहाल, उत्तराखंड की राजनीति के लिहाज से यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए एक रणनीतिक ब्लंडर साबित हुआ है। सैनिक प्रदेश में सेना के अपमान का नैरेटिव चलना ही अपने आप में आत्मघाती है, उस पर से अल्मोड़ा की रैली में न पहुंचना और पौड़ी के कार्यक्रम से पहले देहरादून में पूर्व सैनिकों का गुस्सा भड़कना—इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कांग्रेस ने राष्ट्रवाद और सैन्य अस्मिता की पिच पर भाजपा को बैठे-बैठे एकतरफा ‘वॉकओवर’ दे दिया है। चुनाव से ठीक पहले इस तरह की छवि बनना कांग्रेस की ‘सत्ता वापसी’ की राह को बेहद पथरीला बना देता है।

By उत्तराखंड संवाद भारती

उत्तराखंड संवाद भारती उत्तराखंड सहित देश-दुनिया की ताज़ा, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *