देहरादून में संपन्न स्वदेशी जागरण मंच के प्रांत विचार वर्ग ने आत्मनिर्भर भारत के वैचारिक आधार को किया और मजबूत

देहरादून। आज जब विश्व अर्थव्यवस्था तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, तब भारत में स्वदेशी की अवधारणा केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के व्यापक दर्शन के रूप में उभर रही है। वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद के बढ़ते प्रभाव के बीच यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत अपनी सांस्कृतिक चेतना, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक मूल्यों के आधार पर विकास का कोई वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने और उसे व्यवहारिक धरातल पर उतारने का प्रयास देहरादून में आयोजित स्वदेशी जागरण मंच, उत्तराखंड के दो दिवसीय ‘प्रांत विचार वर्ग’ में दिखाई दिया।

स्वदेशी जागरण मंच, उत्तराखंड प्रांत द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘प्रांत विचार वर्ग’ का सफलतापूर्वक समापन हुआ। शिविर में स्वदेशी के वैचारिक अधिष्ठान, संगठनात्मक सुदृढ़ीकरण, स्वावलंबन आधारित अर्थव्यवस्था तथा आगामी कार्ययोजनाओं पर व्यापक मंथन किया गया। विभिन्न सत्रों में प्रदेशभर से आए कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों ने सहभागिता करते हुए स्वदेशी विचारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

शिविर के उद्घाटन सत्र में अखिल भारतीय संघटक कश्मीरी लाला ने ‘स्वदेशी का वैचारिक अधिष्ठान’ विषय पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में स्वदेशी और स्वावलंबन केवल वैचारिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुके हैं। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन की विकास यात्रा का उल्लेख करते हुए बदलते समय के अनुरूप ‘युगानुकूल स्वदेशी’ की अवधारणा पर प्रकाश डाला और कहा कि स्वदेशी को आधुनिक आवश्यकताओं के साथ जोड़कर समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना होगा।

प्रांत सह संयोजक गौरव कुमार ने बताया कि युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से ‘उद्यमिता विकास-प्रशिक्षण प्रक्रिया एवं स्वावलंबन केंद्र’ की कार्ययोजना पर विस्तृत चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि रोजगार तलाशने वाले युवाओं को रोजगार देने वाला बनाने की दिशा में संगठन विशेष प्रयास कर रहा है। इसके अतिरिक्त स्थानीय उत्पादों और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए स्वदेशी मेलों के आयोजन, उनकी कार्यप्रणाली तथा प्रशिक्षण संबंधी विषयों पर भी मार्गदर्शन प्रदान किया गया।

शिविर में संगठन विस्तार को लेकर कई महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए। इनमें पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की भूमिका, कार्यकर्ताओं के अपेक्षित गुण, संगठनात्मक व्यवहार, टीम वर्क तथा संगठन की कार्यपद्धति पर गहन चर्चा हुई। कार्यकर्ताओं को बताया गया कि किसी भी संगठन की सफलता उसके कार्यकर्ताओं के समर्पण, अनुशासन और सामूहिक प्रयासों पर आधारित होती है।

आर्थिक, सामाजिक तथा सरकारी संस्थाओं के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से ‘प्लगइन सिस्टम’ की कार्यप्रणाली को भी विस्तार से समझाया गया। वक्ताओं ने बताया कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों और संस्थाओं के सहयोग से स्वदेशी विचारों का प्रभाव अधिक व्यापक बनाया जा सकता है।

समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए महिला, युवा एवं वरिष्ठ नागरिक आयामों पर विशेष रणनीति तैयार की गई। कार्यकर्ताओं को बताया गया कि समाज के प्रत्येक वर्ग को संगठन की गतिविधियों से जोड़ना समय की आवश्यकता है और इसके लिए योजनाबद्ध प्रयास किए जाएंगे।

शिविर के दौरान संगठन के प्रेरणास्रोत श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, बाबू गेनू तथा अन्य स्वदेशी पुरोधाओं के जीवन, संघर्ष और विचारों पर भी विशेष सत्र आयोजित किए गए। वक्ताओं ने कहा कि इन महापुरुषों के विचार आज भी राष्ट्र निर्माण और आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में मार्गदर्शक हैं।

स्वदेशी विचारों के प्रभावी प्रचार-प्रसार के लिए सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा डिजिटल अभियानों के उपयोग पर विशेष प्रशिक्षण दिया गया। कार्यकर्ताओं को आधुनिक संचार माध्यमों के प्रभावी उपयोग की जानकारी प्रदान करते हुए बताया गया कि स्वदेशी के संदेश को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मंचों का सशक्त उपयोग आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त संगठन के कार्यालय संचालन, वित्तीय अनुशासन, बैंक खातों के प्रबंधन, निधि संग्रह की पारदर्शी व्यवस्था तथा पर्यावरण संरक्षण में संगठन की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि पारदर्शिता, जवाबदेही और पर्यावरणीय संवेदनशीलता किसी भी सामाजिक संगठन की विश्वसनीयता को मजबूत करती है।

शिविर के अंतिम सत्र में आगामी कार्ययोजना की घोषणा करते हुए निर्णय लिया गया कि स्वदेशी के वैचारिक अधिष्ठान तथा ‘स्वावलंबी भारत अभियान’ को प्रदेश के प्रत्येक जिले, तहसील और ग्राम स्तर तक पहुंचाया जाएगा। इसके लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाए जाएंगे तथा स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक गतिविधियों को और अधिक गति प्रदान की जाएगी।

समापन अवसर पर शिविर के सफल आयोजन के लिए सभी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं एवं स्वामी रामतीर्थ आश्रम प्रबंधन के प्रति आभार व्यक्त किया गया। राष्ट्रगीत के साथ दो दिवसीय विचार वर्ग का विधिवत समापन हुआ।

इस अवसर पर नितिन जोशी, पद्म शर्मा, सुनील, सुशील कुमार, अजय, सुषमा, अलका, शुभाशीष, अमित शर्मा सहित बड़ी संख्या में प्रांत स्तरीय पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

स्वदेशी : केवल आर्थिक अवधारणा नहीं

वर्ग के प्रारंभिक सत्रों में स्वदेशी के वैचारिक अधिष्ठान पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि स्वदेशी का अर्थ केवल देश में निर्मित वस्तुओं का उपयोग करना नहीं है। यह जीवन-दृष्टि का वह व्यापक स्वरूप है जिसमें स्थानीय संसाधनों, स्थानीय कौशल, स्थानीय आवश्यकताओं और राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखा जाता है।

आज जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता अनेक देशों के लिए चुनौती बन रही है, तब स्वदेशी की अवधारणा आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार प्रदान करती है। यह आर्थिक विकास को सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास करती है।

आत्मनिर्भरता का मार्ग : उद्यमिता और कौशल विकास

वर्ग में विशेष रूप से युवाओं के लिए उद्यमिता विकास और स्वावलंबन केंद्रों की भूमिका पर चर्चा हुई। यह तथ्य स्वीकार किया गया कि केवल नौकरी की तलाश करने वाला समाज कभी भी पूर्ण आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। आवश्यकता ऐसे युवाओं की है जो रोजगार पाने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बनें।

स्थानीय उत्पादों, लघु उद्योगों, पारंपरिक कौशल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए स्वदेशी मेले, प्रशिक्षण कार्यक्रम और उद्यमिता विकास केंद्रों को महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा गया। यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के मूल भाव से भी मेल खाता है।

संगठन ही शक्ति है

किसी भी विचार की सफलता उसके संगठनात्मक आधार पर निर्भर करती है। यही कारण रहा कि विचार वर्ग में संगठन निर्माण, कार्यकर्ता विकास और टीम वर्क पर विशेष बल दिया गया। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की भूमिका, नेतृत्व विकास और समन्वित कार्यपद्धति पर हुए सत्रों ने यह स्पष्ट किया कि विचार तभी प्रभावी बनता है जब उसे समर्पित और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का आधार प्राप्त हो।

विशेष रूप से ‘प्लगइन सिस्टम’ की अवधारणा उल्लेखनीय रही, जिसके माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में समन्वय स्थापित करने की रणनीति पर चर्चा की गई। यह आधुनिक संगठनात्मक सोच और पारंपरिक सामाजिक मूल्यों का सुंदर समन्वय प्रतीत होता है।

समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचने का प्रयास

विचार वर्ग में महिला, युवा और वरिष्ठ नागरिक आयामों पर हुई चर्चा इस बात का संकेत है कि स्वदेशी आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान करने की दिशा में गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। किसी भी सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता न हो।

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, युवाओं की ऊर्जा और वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव को एक साथ जोड़कर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की रणनीति इस वर्ग में स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

प्रेरणा के स्रोत और वैचारिक ऊर्जा

दत्तोपंत ठेंगड़ी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, बाबू गेनू और अन्य स्वदेशी पुरोधाओं के जीवन प्रसंगों का स्मरण केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं था, बल्कि वर्तमान चुनौतियों के बीच प्रेरणा प्राप्त करने का प्रयास था।

इन महापुरुषों ने जिस आर्थिक और सामाजिक चिंतन का प्रतिपादन किया था, वह आज भी भारत के विकास विमर्श में प्रासंगिक दिखाई देता है। एकात्म मानव दर्शन, अंत्योदय और स्वदेशी जैसे विचार आज भी भारत की विकास यात्रा को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

डिजिटल युग में स्वदेशी का संवाद

वर्तमान समय सूचना और संचार का युग है। ऐसे में स्वदेशी विचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए डिजिटल माध्यमों की भूमिका को भी प्रमुखता दी गई। सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभावी उपयोग पर हुई चर्चा ने यह स्पष्ट किया कि विचारों की लड़ाई अब केवल सभागारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल मंचों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

भविष्य की दिशा

वर्ग के अंतिम सत्र में घोषित कार्ययोजना ने यह स्पष्ट किया कि स्वदेशी जागरण मंच केवल वैचारिक चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उसे गांव-गांव और व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए संगठित प्रयास करेगा। प्रत्येक जिले, तहसील और ग्राम स्तर तक स्वदेशी चिंतन को ले जाने तथा स्वावलंबी भारत अभियान को गति देने का संकल्प इसी दिशा का संकेत है।

देहरादून में संपन्न यह प्रांत विचार वर्ग एक साधारण प्रशिक्षण कार्यक्रम से कहीं अधिक था। यह उस वैचारिक यात्रा का पड़ाव था, जो भारत को आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और सांस्कृतिक रूप से सशक्त राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। स्वदेशी का यह चिंतन यदि व्यवहार में उतरता है तो वह केवल आर्थिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी आधार बन सकता है।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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