✍️ सुभाष चन्द्र जोशी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक धर्मवीर सिंह का जीवन राष्ट्रसेवा, संगठन निष्ठा, त्याग और संघर्ष की एक अद्भुत गाथा है। उत्तराखंड के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में संघ कार्य को गांव-गांव तक पहुंचाने वाले धर्मवीर सिंह को कार्यकर्ता स्नेहपूर्वक “साइकिल वाले प्रचारक” के नाम से जानते थे। वे उन विरले प्रचारकों में से थे जिन्होंने 1975 के आपातकाल के दौरान सरकार और पुलिस के तमाम प्रयासों के बावजूद गिरफ्तारी से बचते हुए संघ कार्य को न केवल जीवित रखा, बल्कि उसे और अधिक व्यापक बनाया। 23 जून 2026 को उनके निधन के साथ संघ ने एक ऐसे तपस्वी प्रचारक को खो दिया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन संगठन और राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया था। किसान परिवार में जन्म, नौकरी छोड़ चुना राष्ट्रकार्य का मार्ग धर्मवीर सिंह का जन्म 24 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के अस्करीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता श्री विश्वनाथ सिंह कृषक थे और माता श्रीमती मूंगिया देवी धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं। सामान्य ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े धर्मवीर सिंह ने जीवन के शुरुआती वर्षों में सरकारी सेवा भी की। वर्ष 1967 से 1971 तक उन्होंने रामगंगा बांध परियोजना, कालागढ़ के चिकित्सालय में फार्मेसिस्ट के रूप में कार्य किया। लेकिन नौकरी के साथ-साथ उनका मन राष्ट्र जीवन के निर्माण और संगठन कार्य में रमता था। अंततः जुलाई 1971 में उन्होंने सरकारी नौकरी का त्याग कर पूर्णकालिक प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया। इसके बाद उनका जीवन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए समर्पण का पर्याय बन गया। चमोली की घाटियों में शुरू हुआ संगठन विस्तार प्रचारक बनने के बाद उन्हें चमोली और कर्णप्रयाग क्षेत्र में कार्य का दायित्व मिला। उस समय उत्तराखंड का अधिकांश पर्वतीय क्षेत्र सड़क और संचार सुविधाओं से लगभग वंचित था। गांवों तक पहुंचने के लिए कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। धर्मवीर सिंह ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को कभी बाधा नहीं माना। वे साइकिल, बस, ट्रक और पैदल यात्रा करते हुए गांव-गांव पहुंचे। अनेक क्षेत्रों में लोग उन्हें साइकिल पर ही देखा करते थे, जिसके कारण वे “साइकिल वाले प्रचारक” के रूप में प्रसिद्ध हो गए। 1973 से 1975 तक उन्होंने चमोली, कर्णप्रयाग और जोशीमठ तहसीलों में संगठन विस्तार का व्यापक कार्य किया। संघ शिक्षा वर्ग, फिरोजाबाद में उन्हें चमोली जिला प्रचारक घोषित किया गया। आपातकाल और भूमिगत संघर्ष की शुरुआत 4 जुलाई 1975 को वे गोपेश्वर पहुंचे ही थे कि रात में रेडियो पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध और देश में आपातकाल लागू होने की घोषणा हुई। 5 जुलाई की रात 11 बजे उन्होंने गोपेश्वर छोड़ दिया और यहीं से शुरू हुआ उनका भूमिगत जीवन। संघ के वरिष्ठ नेता प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ ने उन्हें सम्पूर्ण गढ़वाल मंडल के चारों जिलों—चमोली, पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी—का दायित्व सौंपा।उस समय अधिकांश प्रचारक गिरफ्तार किए जा चुके थे या क्षेत्र छोड़ चुके थे। गढ़वाल में वे एकमात्र सक्रिय प्रचारक थे जो लगातार भूमिगत रहकर संगठन का संचालन कर रहे थे। गिरफ्तारी वारंट, कुर्की और प्रशासन की बेचैनी धर्मवीर सिंह की गिरफ्तारी के लिए चमोली जिले से वारंट जारी हुआ। पुलिस लगातार उनकी तलाश कर रही थी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उनके पैतृक गांव अस्करीपुर, बिजनौर में स्थित घर तक कुर्की की कार्रवाई के आदेश पहुंच गए। गढ़वाल के चारों जिलाधिकारियों और चारों पुलिस अधीक्षकों से उनके संबंध में जवाब-तलब किया गया। प्रशासनिक स्तर पर भारी दबाव था कि आखिर धर्मवीर सिंह गिरफ्तारी से कैसे बच रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी गिरफ्तारी न हो पाने के कारण चमोली के तत्कालीन जिलाधिकारी आदित्य कुमार रस्तोगी और पौड़ी के जिलाधिकारी देवमणि बनर्जी तक का स्थानांतरण कर दिया गया। जब पुलिस हर बार रह गई एक कदम पीछे धर्मवीर सिंह स्वयं बताते थे कि कई अवसर ऐसे आए जब पुलिस उनसे कुछ ही कदम दूर थी, लेकिन हर बार वे बच निकलते थे। उनकी वेशभूषा साधारण होती थी। वे भीड़ में आसानी से घुल-मिल जाते थे। कई बार गुप्तचर एजेंसियों की सूचनाएं एक-दूसरे से विरोधाभासी निकलती थीं। किसी को लगता वे चमोली में हैं, किसी को पौड़ी में और किसी को हरिद्वार में। इस भ्रम के कारण पुलिस प्रशासन को लगातार आलोचना झेलनी पड़ती थी। धर्मवीर सिंह कहा करते थे कि बिना बोले उनके अपने गांव में भी कई लोग उन्हें पहचान नहीं सकते थे। यही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा थी। 125 केंद्रों तक पहुंचने वाला अद्भुत संपर्क तंत्र आपातकाल के दौरान उनका सबसे बड़ा कार्य था संगठन के संपर्क सूत्र को जीवित रखना। वे हर महीने दो बार सम्पूर्ण गढ़वाल का दौरा करते थे। लगभग 125 स्थान ऐसे थे जहां उनका नियमित संपर्क बना रहता था। 80 स्थानों पर वे प्रत्येक पंद्रह दिन में पहुंचते थे और लगभग 45 अन्य स्थानों पर महीने में एक बार। अक्सर एक ही दिन में सात-आठ गांवों तक पहुंचना पड़ता था। भोजन, आराम और मौसम की परवाह किए बिना वे पहाड़ों की पगडंडियों पर चलते रहते थे। उनका उद्देश्य केवल एक था—किसी भी परिस्थिति में संगठन की गतिविधियां बंद नहीं होनी चाहिए। ‘गढ़वाल टाइम्स’ बना लोकतंत्र की आवाज आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लागू थी। समाचार पत्र सरकार के विरुद्ध कुछ भी प्रकाशित नहीं कर सकते थे। ऐसे समय में धर्मवीर सिंह ने एक अनोखा प्रयोग किया। बीएचईएल हरिद्वार के सहायक अभियंता सूरी के सहयोग से उन्होंने “गढ़वाल टाइम्स” नामक एक लघु समाचार पत्र निकालना शुरू किया। कापी के एक छोटे पन्ने के आकार का यह समाचार पत्र साइक्लोस्टाइल मशीन से छपता था। इसमें वे समाचार प्रकाशित होते थे जिन्हें सरकार दबा रही थी—गिरफ्तारियां, जेलों की यातनाएं, प्रशासनिक दमन और जनता पर हो रहे अत्याचार। शीर्षक के ऊपर लिखा रहता था— “पढ़िये! पढ़ाइये! पढ़कर सुनाइये!” यह केवल समाचार पत्र नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की दबाई गई आवाज था। चौराहों पर छोड़ आते थे लोकतंत्र के संदेश धर्मवीर सिंह स्वयं गढ़वाल टाइम्स की प्रतियां लेकर निकलते थे। वे गांवों में लोगों को देते थे और जहां कोई नहीं मिलता था वहां पगडंडियों, तिराहों, चौराहों और झाड़ियों में प्रतियां छोड़ देते थे। ग्रामीण उन्हें उठाकर गांवों में ले जाते और सामूहिक रूप से पढ़ते-सुनते थे। इस प्रकार सेंसरशिप की दीवारों को तोड़कर वास्तविक समाचार जनता तक पहुंचते थे। अधिकारियों को भी भेजते थे गढ़वाल टाइम्स धर्मवीर सिंह का साहस केवल यहीं तक सीमित नहीं था। वे जिलाधिकारियों, पुलिस अधीक्षकों और अन्य अधिकारियों को भी डाक द्वारा गढ़वाल टाइम्स की प्रतियां भेजते थे। जैसे ही लिफाफे खुलते, प्रशासनिक हलकों में हलचल मच जाती थी। पुलिस जानती थी कि इसके पीछे धर्मवीर सिंह हैं, लेकिन वे यह नहीं जान पाती थी कि वह कहां हैं और समाचार पत्र कैसे पहुंच रहे हैं। जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के परिवारों के संरक्षक आपातकाल के दौरान हजारों स्वयंसेवक जेलों में बंद थे। धर्मवीर सिंह उनके परिवारों से लगातार संपर्क बनाए रखते थे। जिन परिवारों को आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती थी, उन्हें संगठन के माध्यम से सहयोग उपलब्ध कराया जाता था। वे स्वयं सहायता राशि पहुंचाते थे और परिवारों का मनोबल बढ़ाते थे। उनका मानना था कि जेल में बंद कार्यकर्ता तभी संघर्ष कर सकेंगे जब उनके परिवार सुरक्षित और आत्मविश्वास से भरे होंगे। 21 महीने का संघर्ष और अमिट विरासत इक्कीस महीनों तक चला यह संघर्ष केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संगठनात्मक प्रतिबद्धता की परीक्षा थी। धर्मवीर सिंह इस परीक्षा में पूरी दृढ़ता के साथ खरे उतरे। आपातकाल समाप्त होने के बाद वे पुनः चमोली जिला प्रचारक बने और बाद के वर्षों में मेरठ जिला प्रचारक, उत्तराखंड प्रांत सेवा प्रमुख, प्रांत कार्यालय प्रमुख सहित अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। पहाड़ों में आज भी जीवित है उनकी स्मृति धर्मवीर सिंह केवल एक प्रचारक नहीं थे, बल्कि संगठन और समाज के बीच जीवंत सेतु थे। उन्होंने साइकिल, पैदल यात्राओं और अनवरत संपर्क के माध्यम से जो संगठनात्मक विरासत बनाई, वह आज भी हजारों स्वयंसेवकों को प्रेरित करती है। उनका जीवन बताता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प, त्याग और राष्ट्रभक्ति के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य भी संभव किए जा सकते हैं। आज जब उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है, तो पहाड़ों की पगडंडियों पर साइकिल चलाते हुए एक तपस्वी प्रचारक की छवि स्वतः आंखों के सामने उभर आती है, जिसने कठिनतम परिस्थितियों में भी राष्ट्र और संगठन की ज्योति को बुझने नहीं दिया। Post navigation स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग: सक्रिय और संतुलित जीवन की कुंजी