चंद्रशेखर तिवारी, वरिष्ठ शोध अधिकारी दून लाइब्रेरी देहरादून


क्या देहरादून में जलभराव का कारण सिर्फ बारिश है?

दून घाटी की प्राकृतिक जलधाराएँ, गदेरे, तालाब और नालों पर बढ़ते अतिक्रमण ने शहर की जल निकासी व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह लेख बताता है कि कैसे प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही देहरादून को जलभराव और भविष्य के जल संकट से बचाया जा सकता है।

बरसात शुरू होते ही देहरादून की तस्वीर बदल जाती है। कुछ घंटों की तेज वर्षा के बाद ही शहर की सड़कें तालाब बन जाती हैं। आईएसबीटी, पटेलनगर, कारगी चौक, बल्लूपुर, धर्मपुर, हरिद्वार बाईपास,सहस्रधारा रोड और कई आवासीय कॉलोनियों में पानी भर जाता है। वाहन रेंगने लगते हैं, दुकानों और घरों में पानी घुस जाता है और लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है। हर साल यही दृश्य दोहराया जाता है और हर बार सवाल उठता है— क्या इसके लिए केवल बारिश ही जिम्मेदार है? सच यह है कि समस्या बारिश नहीं, बल्कि हमने अपने शहर के प्राकृतिक भूगोल को बिसरा दिया है।
देहरादून कोई मैदानी शहर नहीं है। यह उत्तर में मसूरी और दक्षिण में शिवालिक पर्वतमाला के बीच बसी एक प्राकृतिक घाटी संरचना में बसा हुआ शहर है। मसूरी की पहाड़ियों पर गिरने वाला पानी सदियों से रिस्पना, बिंदाल, जाखन, राजपुर, नालापानी, सहस्रधारा, मालदेवता और अनेक छोटे-छोटे गदेरों के माध्यम से घाटी से बाहर निकलता रहा है। यही प्राकृतिक जल निकास व्यवस्था देहरादून की सबसे बड़ी ताकत थी।
ब्रिटिश काल के देहरा दून गजेटियर और हिमालयन गजेटियर में इस घाटी को जलधाराओं और झरनों की घाटी बताया गया है। उस समय रिस्पना और बिंदाल केवल बरसाती नाले नहीं थे, बल्कि साल भर बहने वाली स्वच्छ नदियाँ थीं। उनके किनारे प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र थे, जहाँ वर्षाजल ठहरता, धीरे-धीरे जमीन में समाता और भूजल को समृद्ध करता था। बीजापुर और राजपुर जैसी नहरें खेतों तक पानी पहुँचाने के साथ-साथ भूजल पुनर्भरण का भी काम करती थीं। अनेक परम्परागत घराट इन्हीं जलधाराओं की ऊर्जा से चला करते थे।
लेकिन पिछले तीन-चार दशकों में शहर का विस्तार बिना उसके भूगोल को समझे और उसके संरक्षण के बगैर चलता आ रहा है । नदियों व जल धाराओं के किनारे मकान बन गए, छोटे-छोटे गदेरे पाट दिए गए, तालाबों और दलदली भूमि पर कॉलोनियाँ बसने लग गईं और खेतों की जगह पर कंक्रीट ने अपना स्थान ले लिया ।
पहले वर्षाजल का बड़ा हिस्सा जमीन में समा जाता था, अब वही पानी सीधे सड़कों पर बहता है। ऊपर से नालियों में प्लास्टिक, मलबा और कूड़ा भर जाने से पानी के निकलने का रास्ता भी बंद हो जाता है। परिणाम सामने है—थोड़ी देर की बारिश और पूरा शहर जलमग्न।
यह केवल यातायात की समस्या नहीं है। जलभराव से सड़कें टूटती हैं, व्यापार प्रभावित होता है, डेंगू और अन्य जलजनित रोग फैलते हैं। विडंबना यह भी है कि भूजल की कमी से कई बार शहर पेयजल संकट से भी जूझने लगता है। इसका अर्थ साफ है कि हम वर्षाजल को सहेज नहीं पा रहे हैं।
समाधान भी प्रकृति के भीतर ही छिपा है। यदि देहरादून की सभी प्राकृतिक जलधाराओं, गदेरों और पुराने नालों का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार किया जाय और जिन जलमार्गों पर अतिक्रमण हुआ है, उन्हें चरणबद्ध ढंग से मुक्त कर पुनर्जीवित करने का प्रसास किया जाय तो रिस्पना और बिंदाल सीवेज नाला नहीं, नदी के रूप संरक्षित हो सकती है। पुराने तालाबों और आर्द्रभूमियों को बचाने का सार्थक प्रयास करना आवश्यक होगा। क्योंकि यह भी .प्राकृतिक जल भंडार हैं।
शहर में वर्षाजल संचयन केवल कागज़ी नियम न रहे, इस पर भी विचार होना जरुरी है। हर सरकारी भवन, विद्यालय, संस्थान और बड़े आवासीय परिसर में यह प्रभावी रूप से लागू हो सकता है।। सड़क निर्माण के समय वैज्ञानिक ढाल, पर्याप्त नालियाँ और वर्षाजल निकासी की व्यवस्था अनिवार्य बनानी होगी । नगर निगम को मानसून से पहले नालियों की सफाई केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अभियान के रूप में करनी चाहिए। साथ ही नागरिकों को भी यह अच्छे से समझना होगा कि नालियों में फेंका गया प्लास्टिक अंततः हमारे ही घरों तक पानी बनकर लौटता है।
कुल मिलाकर देहरादून का भविष्य केवल नई सड़कों, फ्लाईओवरों और ऊँची इमारतों से सुरक्षित नहीं समझा जा सकता । सही मायनों में यह तभी सुरक्षित हो सकेगा जब हम यहां के गदेरों, जलधाराओं, नहरों, नदियों, तालाबों को फिर से जीवित करने का अथक प्रयास कर पायें । सतत विकास का सही अर्थ प्रकृति को बिसराकर उसके दायरे से बाहर न जाकर अपितु उसके साथ चलकर रहने से ही होगा।
दून घाटी हमें हर मानसून में एक ही संदेश देती है—यदि हम जल प्रवाह के रास्ते बंद कर देंगे, तो जलधाराएं . भी अपना रास्ता स्वयं बना लेंगी और हमारे घरों के इर्दगिर्द बहने लगेंगी । ऐसे में अब यह निर्णय हमें करना होगा .कि हम देहरादून को जलभराव वाला शहर बनाना चाहते हैं या फिर उसकी मूल प्राकृतिक पहचान को बचाकर रखना चाहते हैं, जिसने कभी इसे सचमुच “जलधाराओं की घाटी” बनाया था।

By उत्तराखंड संवाद भारती

उत्तराखंड संवाद भारती उत्तराखंड सहित देश-दुनिया की ताज़ा, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *