— नरेन्द्र कुमार सिंह डॉ. कमल किशोर डुकलान ‘सरल’ की साहित्य साधना निरंतर गतिमान है। उत्तराखंड भाषा संस्थान, देहरादून के सहयोग से प्रकाशित उनकी प्रथम गद्य कृति “भारतीय पर्व एवं उत्सव : एकता और सद्भावना” को मिली सराहना के बाद अब उनका दूसरा महत्त्वपूर्ण गद्य-संग्रह “विविधा” पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। यह कृति विविध विषयों पर लिखे गए 27 उत्कृष्ट, सारगर्भित और विचारोत्तेजक आलेखों का सुसंगठित संकलन है, जो पूर्व में विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। “विविधा” शीर्षक के अनुरूप यह पुस्तक विषय-विविधता, वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों का सुंदर संगम है। पांडुलिपि के गंभीर अध्ययन के उपरांत यह स्पष्ट होता है कि डॉ. डुकलान की यह कृति न केवल चिंतनपरक है, बल्कि भाषा, शिल्प और प्रस्तुति की दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावशाली एवं सुरुचिपूर्ण है। डॉ. कमल किशोर डुकलान ‘सरल’ पिछले तीन दशकों से अधिक समय से देश के प्रतिष्ठित शैक्षिक संगठन विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की शिशु मंदिर योजना से जुड़े हुए हैं। एक शिक्षक, चिंतक और समाजधर्मी साहित्यकार के रूप में अर्जित उनका यह दीर्घ अनुभव पुस्तक के अनेक आलेखों में सजीव रूप से परिलक्षित होता है। पुस्तक का प्रथम आलेख “व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की ओर विद्या भारती” विद्या भारती के शैक्षिक दर्शन, उद्देश्यों और राष्ट्रोन्मुख दृष्टि का प्रभावशाली प्रतिपादन करता है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि विद्या भारती का मूल उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से चरित्रवान, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना है। व्यक्ति निर्माण को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला मानने वाला यह दृष्टिकोण भारतीय शिक्षा-दर्शन की मूल आत्मा को अभिव्यक्त करता है। लेखक ने यह भी रेखांकित किया है कि विद्या भारती के शिक्षण संस्थान केवल शिक्षा प्रदान करने वाले केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय चेतना के संवाहक हैं। इन संस्थानों की विशेषता यह है कि इनका उद्देश्य व्यवसायिक लाभ नहीं, बल्कि समाज के सहयोग से समाज और राष्ट्र के हित में कार्य करना है। शिक्षक, प्रबंधतंत्र, विद्यार्थी, अभिभावक, शिक्षाविद और समाजसेवी—इन सभी के सामूहिक प्रयास से यह संगठन व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया को राष्ट्र निर्माण की दिशा देता है। पुस्तक का दूसरा आलेख “भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वभाषा एवं संस्कृति” भारतीय ज्ञान-संपदा, सांस्कृतिक आत्मबोध और भाषिक स्वाभिमान का सशक्त प्रतिपादन करता है। लेखक ने इस आलेख में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, राष्ट्रीय आत्मगौरव के जागरण और भारत-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। स्वभाषा और संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ने तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को पुष्ट करने का विचार इस आलेख का प्रमुख संदेश है। डॉ. डुकलान का शिक्षकीय अनुभव पुस्तक के अंतिम आलेख में विशेष रूप से प्रकट होता है, जहाँ उन्होंने शिक्षक की भूमिका को यम और नियम के सिद्धांतों के आलोक में परिभाषित किया है। लेखक का मानना है कि शिक्षा में नैतिक अनुशासन, आत्मसंयम, स्वच्छता, सत्य, संतोष और आत्मनियंत्रण जैसे मूल्यों का समावेश विद्यार्थियों के संतुलित व्यक्तित्व निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि शिक्षक स्वयं इन सिद्धांतों पर आधारित जीवन जिए, तभी वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण की रचनात्मक दिशा दे सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के संदर्भ में पुस्तक का महत्त्वपूर्ण आलेख “स्वराज का संकल्प और संघ विकास यात्रा” विशेष उल्लेखनीय है। इस आलेख में लेखक ने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के व्यक्तित्व, चिंतन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की विकास यात्रा को तथ्यपरक एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। पुस्तक का 24वाँ आलेख भारत रत्न, पूर्व राष्ट्रपति एवं ‘मिसाइल मैन’ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को समर्पित है। लेखक ने डॉ. कलाम के व्यक्तित्व में निहित सादगी, विनम्रता, ईमानदारी और राष्ट्रसमर्पण को प्रेरक शैली में अभिव्यक्त किया है। इसके अतिरिक्त “विविधा” के अन्य आलेख शिक्षा, साहित्य, पर्यावरण, पर्व-त्योहार, जीवनशैली, सामाजिक संबंध, नैतिक शिक्षा, समरस समाज, छात्र जीवन, परीक्षा, उत्तराखंड की जागर लोकसंस्कृति, प्राचीन बेड़ा लोकपरंपरा तथा विज्ञान जैसे विविध विषयों को समेटे हुए हैं। इन आलेखों में लेखक का व्यापक अध्ययन, परिपक्व चिंतन और सामाजिक संवेदना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। पुस्तक की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लेखक ने अपने प्रत्येक आलेख में विषयानुकूल तर्क, तथ्य और प्रमाणिक जानकारी का संतुलित उपयोग किया है, जिससे आलेख न केवल रोचक बनते हैं, बल्कि पाठकों के लिए विश्वसनीय और उपयोगी भी सिद्ध होते हैं। डॉ. कमल किशोर डुकलान ‘सरल’ में साहित्य-सृजन की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। पिछले लगभग तीन दशकों से वे अध्ययन, अध्यापन और सतत लेखन में सक्रिय हैं। यही कारण है कि उनके लेख क्षेत्रीय से राष्ट्रीय स्तर तक की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे हैं। निस्संदेह, “विविधा” केवल एक लेख-संग्रह नहीं, बल्कि विचार, संस्कृति, समाज और राष्ट्रबोध का गंभीर दस्तावेज है। यह कृति पाठकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा साहित्य-प्रेमियों के लिए समान रूप से उपयोगी और प्रेरणास्पद सिद्ध होगी। Post navigation बात सड़क पर