देहरादून। उत्तराखंड के गढ़वाली संस्कृति के पुरोधा जीत सिंह नेगी के निधन हो गया है। श्री नेगी एक जमाने में प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगायक तो रहे ही, उन्होंने यहां के लोकसाहित्य पर लेखनी भी चलाई। ’तू ह्वेली ऊंचि डांड्यों मा बीरा’ उनका गीत आज से लगभग चालीस साल पहले हर जुबान पर होता था। इस गीत ने उन्हें खूब पहचान दिलायी।
जीत सिंह नेगी ने छह दशक से अधिक समय गढ़वाली गीतों की सृष्टि करने में लगाया। 02 फरवरी,1927 में ग्राम-अयाल, पट्टी- पौडुलस्यूं, पौड़ी गढ़वाल में जन्मे जीत सिंह नेगी न केवल गायक और गीतकार थे, अपितु उच्च कोटि के नाटककार भी रहे। उन्होंने ’मलेथा की कूल’, ’भारी भूल’ जैसे कालजयी नाटक रचे हैं। ’गीत गंगा’, ’जौंळ मगरी’ और ’म्यारा गीत’ उनके गीत संग्रह हैं। उनके गीतों में पहाड़ की संस्कृति की भीनी-भीनी सुगंध महकती है। उनमें पहाड़ के परिवेश का ज्वलंत प्रतिबिंबन है। अपने जीवनपर्यंत लोगों की ‘खुद’ बिसराने वाले इस महान गायक को भावभीनी श्रद्धांजलि।





