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जब बदल रहे जल, जंगल, जमीन के मायने तो कैसे बचेगा पर्यावरण

उत्तराखंड में जल, जंगल,जमीन के पायने बदल गये हैं,भौगोलिक विषमता युक्त राज्य में असुरक्षित पर्यावरण के कारण प्राकृतिक संघर्ष की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं…….

सृष्टि के प्रारंभ से ही नदियों और वनों को देवतुल्य सम्मान देकर पूजा जाता है,जमीन को मां का दर्जा दिया जाता है, जबकि आधुनिक जीवन शैली ने इन शब्दों के मायने बदल दिए हैं।इन तीनों के साथ खिलवाड़ और व्यक्तिगत लालसाओं के चलते प्रकृति को हम संरक्षित करने के बजाय नष्ट करने में लगे हैं जिसका नतीजा है कि प्रकृति हमारे आपदाओं को लेकर हमारे विरुद्ध खड़ी नजर आती है। वन खत्म हो रहे हैं या किए जा रहे हैं, नदियों का जल स्तर घटकर लगातार सूख रही हैं,जो कुछ बची हैं वे या तो प्रदूषित हो गई हैं या फिर बड़ी-बड़ी कंपनियों के कब्जे में हैं।जमीन का अंधाधुंध अधिग्रहण और कॉर्पोरेट भूमाफियों की सांठ-गांठ से आम लोग तो विस्थापित हो ही रहे हैं साथ ही जमीन भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
प्राकृतिक संघर्ष की घटनाएं भौगोलिक विषमता युक्त उत्तराखंड में बढ़ती जा रही हैं। इसका बड़ा कारण आधिपत्य का भाव है। यह अधिपत्य का भाव आज संघर्ष में तब्दील हो चुका है। दरअसल यह संघर्ष खास वर्ग की लालसा, सरकारी नीतियों और संसाधनों पर कब्जे से उत्पन हुआ है। यही विषमता और खास वर्गों की हितकारी नीतियों ने प्राकृतिक संसाधनों को दिनों-दिन नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई है। परंतु आरंभ से ऐसा नहीं था ।
इस भरत भूमि पर मानव जाति के पदचिह्न बहुत पुराने हैं। कई युग पहले ही भारत ने प्राकृतिक वन भूमि की स्थिति को त्याग दिया था। एक हजार साल पहले, प्रस्तर युग में ही विन्ध्याचल के पहाड़ों में जंगली सूअर और हिरणों का शिकार, मधु संग्रहण और सपाट मैदानों के निवासियों के साथ व्यापार आम बात थी। मध्य प्रदेश की भोपाल के पास गुफाओं में पाई जाने वाली चित्रकारी इस बात का सबूत हैं। पाँच हजार साल पहले विंध्य के पशुपालक भेड़ों के लिए कटघरा बनाने के लिए ताल के पेड़ काटते थे और अपने को गर्म रखने के लिए उपले जलाते थे मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे पर निर्भर थे ।

आरंभ में प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता ‘उपयोग’ था न की आज कि तरह ‘उपभोग’ का जैसे-जैसे आबादी बढ़ने लगी प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता कमजोर होता चला गया।हमने आज प्रकृति को अपनी मुट्ठी में कर रखा है और उसका संरक्षण करने के बजाय हम भरपूर दोहन करने में लगे हैं । यह दोहन औपनिवेशिक काल से आरंभ होकर आज बदस्तूर जारी है।अगर हमें एक ऐसी मशीन मिल जाए जिसमें बैठकर समय की सैर कर सकें और 18वीं शताब्दी के बीच के भारत की झांकी को देखकर तुरंत दो शताब्दी आगे पहुंचें तो हमें एक ऐसा उपमहाद्वीप दिखाई देगा जहां पानी और भूमि का चेहरा पूरी तरह बदल गया है।इस बदलाव के पीछे उपनिवेशी मानसिकता और मनुष्य की असीमित लालसों की बड़ी भूमिका है।
गांधी ने भविष्य को”रंग इण्डिया” पुस्तक में लिखा कि “भगवान न करे कि भारत कभी भी पश्चिम के देशों कि तरह औधोगीकरण को अपनाए। एक छोटे से द्वीप राज्य (इंग्लैण्ड) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने आज सारी दुनिया को बन्दी बना रखा है। अगर 30 लाख लोगों का देश इस प्रकार के बर्ताव पर उतर आए तो दुनिया ही उजड़ जाएगी”।

गांधी की यह चिंता लाज़मी थी। आज के भारत की स्थिति को देखते हुए यह भय पैदा करने वाला विचार है।यह बात तो हुई बर्बरता और उपभोग की लेकिन आज हमारी मूल चिंता है संरक्षण। कैसे हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करें ? क्योंकि मनुष्य और प्रकृति का संबंध जीवन-मरण का संबंध है।आधुनिक सभ्यता ने इस संबंध को कमजोर करने के साथ समाप्त करने का प्रयास किया है।
हमारे जीने के तरीके और पर्यावरण से संबंध रखने पर गांधी की दी गई आधुनिक सभ्यता की दार्शनिक आलोचना बहुत मायने रखती है- गांधी जी के विचार और ‘आधुनिक सभ्यता’ के विकास के बीच ही कहीं न कहीं संरक्षण के बीज भी हमें खोजने होंगे।जिनमें गांधी जी का यह कथन कि ‘प्रकृति में सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता है पर लालसा एक मनुष्य की भी नहीं’। इस पूरे संदर्भ को देखें तो हम पाते हैं कि इस बेलगाम प्राकृतिक दोहन का मुख्य कारण हमारी बढ़ती जरूरतें और अनियंत्रित लालच है। इसलिए संरक्षण में सबसे पहले हमें अपनी जरूरतों और लालसाओं पर नियंत्रण करना होगा ।

कहीं वर्षों से सुनते आ रहे हैं,कि अगला विश्वयुद्ध यदि हुआ तो उसका कारण जल-संकट होगा।संसार में उपलब्ध जल का 97 प्रतिशत जल खारा है, शुद्ध जल की मात्रा सिर्फ़ तीन प्रतिशत है। उसमें से दो प्रतिशत उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों पर बर्फ़ के रूप में जमा हुआ है। शेष एक प्रतिशत जल में से आधा भू-जल है और आधा वर्षा के रूप में धरती पर प्राप्त होता है,जिसे सहेजकर रखने की परम्परा अब तक भारत में विकसित नहीं हो पाई है। कम-वृक्षारोपण और रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपनाने की अनिवार्यता होनी चाहिए। मीरा बेन ने 1949 में लिखा-‘दुख की बात है कि आज के शिक्षित और संपन्न वर्ग अपने अस्तित्व का मूलाधार धरती माता और उससे पोषित जीवों से अनजान हैं। मौका मिलते ही मनुष्य प्रकृति की सुनियोजित से-कम नवनिर्मित भवनों में दुनिया को लूटने, समाप्त करने में और अव्यवस्थित करने में लग जाता है।अपने विज्ञान और मशीनों के प्रयोग से कुछ समय के लिए उसे भले ही बहुत लाभ मिलता हो, परन्तु उसका अन्तिम परिणाम विध्वंस ही होगा’। अगर शारीरिक और नैतिक रूप से स्वस्थ जाति बनकर हमें जीना है तो प्रकृति के संतुलन को समझ कर हमें उनके कानून का पालन करना चाहिए। जल जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए निम्न बिन्दुओं पर ध्यान देना समचीन होगा ।

भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ अधिसंख्यक आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है और बुनियादी सुविधाओं से वंचित है,वहाँ सरकार का यह दायित्व है कि औद्योगीकरण से लेकर आवास-समस्या हल करने तक जितनी भी नीतियाँ बनायी जायें उनमें पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये।दुर्भाग्यवश,आज भी भारत की नीतियाँ विश्व बैंक और हार्वर्ड द्वारा ही निर्धारित की जाती हैं, जिनकी सोच भारतीय आवश्यकताओं से कतई मेल नहीं खाती। सरकार को स्वयं ही अपने देश की आवश्यकता को ध्यान में रखकर अपनी क्षमता के अनुरूप उन्नति, विकास एवं पर्यावरण, संरक्षण हेतु नीतियों का निर्धारण करना चाहिए और इसमें विभिन्न संस्थाओं के साथ-साथ जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
कमल किशोर डुकलान, रुड़की (हरिद्वार)

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