✍️ सुभाष चंद्र जोशी ”हमारा डीएनए भारतीय है..” इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो का यह वक्तव्य भारत ही नहीं दुनिया के लिए सनातन धर्म का संदेश देता है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो द्वारा जकार्ता में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए यह कहना कि डीएनए परीक्षण में उनके भीतर भारतीय मूल के आनुवंशिक अंश पाए गए, केवल मात्र एक कथन ही नहीं है बल्कि भारत तथा इंडोनेशिया के बीच अनंत काल से आ रही सांस्कृतिक धरोहर की पहचान है। सुबियांतो भाषण में भारतीय संगीत, संस्कृति और साझा ऐतिहासिक विरासत के प्रति अपनापन स्पष्ट दिखाई दिया। ऐसे वक्तव्य यह याद दिलाते हैं कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों पर भारतीय संस्कृति, दर्शन, व्यापार और भाषाई परंपराओं का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है। भारत और इंडोनेशिया के संबंधों की वास्तविक मजबूती का आधार साझा इतिहास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, समुद्री व्यापार, रामायण-महाभारत की परंपरा, संस्कृत का प्रभाव और सदियों से चले आ रहे सामाजिक संपर्क हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति के इस वक्तव्य को कई लोग एक ऐसे संदेश के रूप में देख रहे हैं कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव आधुनिकता के विरुद्ध नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का प्रतीक हो सकता है। इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है, फिर भी वहां की सांस्कृतिक पहचान में रामायण, महाभारत, गरुड़, संस्कृत-प्रभावित शब्दावली और अनेक प्राचीन भारतीय परंपराओं की छाप आज भी दिखाई देती है। इससे यह संदेश मिलता है कि सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार करना किसी धार्मिक या राजनीतिक पहचान के विरोध में नहीं है। भारतीय संदर्भ में यह प्रसंग आत्ममंथन का अवसर अवश्य देता है। अक्सर सार्वजनिक जीवन में संस्कृति, सभ्यता या सनातन परंपरा पर चर्चा राजनीतिक विवाद का विषय बन जाती है। कुछ लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर अत्यधिक आग्रह रखते हैं, तो कुछ उससे दूरी बनाकर चलना उचित समझते हैं। लोकतांत्रिक समाज में दोनों प्रकार के विचारों के लिए स्थान है। किंतु अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना किसी भी राष्ट्र के आत्मविश्वास का आधार माना जाता है। भारत की सभ्यता केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रही है। यह विविध भाषाओं, आस्थाओं, दर्शन, साहित्य, कला और जीवन मूल्यों का विशाल संगम है। इसी कारण भारतीय संस्कृति का प्रभाव एशिया के अनेक देशों तक पहुंचा। इस विरासत को समझना और उसका अध्ययन करना राष्ट्रीय गौरव का विषय हो सकता है, बशर्ते इसे समावेशी और ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए। राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो का वक्तव्य यह भी बताता है कि दुनिया के कई देश भारत को केवल एक आधुनिक आर्थिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता के रूप में भी देखते हैं। जब विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है, तो यह भारत के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, अध्ययन और विश्व के सामने उसके सकारात्मक प्रस्तुतीकरण का अवसर बन सकता है। इस प्रसंग का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था या सैन्य क्षमता में नहीं होती, बल्कि उसकी सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक चेतना और आत्मविश्वास में भी होती है। यदि दुनिया भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक योगदान का सम्मान करती है, तो भारत में भी इस विरासत पर विमर्श तथ्यों, इतिहास और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए—न कि केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से। अपनी जड़ों का सम्मान और विविधता का आदर, दोनों साथ-साथ चल सकते हैं; यही भारत की सबसे बड़ी विशेषता रही है। Post navigation चार किमी पैदल चलकर मेधावी छात्रवृत्ति परीक्षा देने पहुंचे छात्र परीक्षा केन्द्र, भूस्खलन बना सिरदर्द उत्तराखंड: SARRA बैठक में नदी पुनर्जीवन परियोजनाओं पर चर्चा, गरुड़ गंगा और पश्चिमी नयार के लिए 60 करोड़ की योजना