हरिद्वारः देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि नवरात्र साधना साधक के मानसिक व शारीरिक स्तर को सुधारने में सहायक है। इस दौरान की गयी साधना सफलता की सीढ़ी का द्वार खोलती है। साधना, स्वाध्याय व उपासना के साथ हवन का भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान है।
वे देसंविवि के मृत्युंजय सभागार में चल रहे नवरात्र सत्संग के क्रम में मातृ अष्टमी को गीता के चैथे अध्याय के २९वें श्लोक की व्याख्या कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नाभि के नीचे स्थित प्राण को अपान कहा गया है। प्राणायाम के माध्यम से अपान को शुद्ध कर उस प्राण से हवन करना चाहिए। अपान और प्राण के विकार को नष्ट करना नवरात्र साधना का प्रमुख उद्देश्यों से एक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने जैविक और मानसिक प्रकृति के बीच तालमेल बिठाना चाहिए। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा बीमारियाँ पेट और हृदय की वजह से हो रही है। जिसका प्रमुख कारण अपान प्राण अवरुद्ध होना है। उन्होंने कहा कि आज का व्यक्ति वासनाओं से मुक्त नहीं हो पा रहा है। मनुष्य के भीतर लालसाएँ भरी पड़ी हैं। व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं को पाने के लिए प्रयत्नशील है और वे कामनाओं में भटक रहा है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि बुराइयों को त्यागकर अच्छाइयों की ओर चलो। इस नवरात्र साधना में साधक को अच्छाइयों की ओर अग्रसर होने का प्रयास करना चाहिए। इससे पूर्व आइये श्रेष्ठजन शुभ हवन के लिए. गीत की प्रस्तुति संगीत कक्ष के भाइयों द्वारा की गयी। इस अवसर पर नवरात्र साधना में जुटे देसंविवि परिवार व शांतिकुंज के अंतेवासी भाई-बहिन उपस्थित रहे। समापन से पूर्व सभी ने महाआरती में भाग लिया।




