गोपेश्वर। प्रख्यात पर्यावरणविद और चिपको नेता चंडी प्रसाद भट्ट ने शुक्रवार को ‘चिपको आंदोलन’ के पचासवें वर्ष में प्रवेश करने पर आयोजित समारोह में आंदोलन के नायकों को याद करते हुए कहा कि इस घटना ने वनों के संरक्षण की दिशा ही बदल दी।
एक अप्रैल 1973 को मंडल घाटी के जंगलों को वन ठेकेदारों से बचाने के लिए पहली बार सार्वजनिक प्रस्ताव के द्वारा पेड़ों पर चिपक कर पेड़ बचाने का उद्घोष किया गया था जिसके बाद 24 अप्रैल 1973 को मंडल घाटी में ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई।
इस मौके पर ‘चिपको-50 साल और आगे की दिशा’ विषयक एक गोष्ठी का आयोजन भी किया गया जिसमें इस साल वर्ष भर आंदोलन की स्वर्ण जयंती को मनाने का निर्णय लिया गया।
उनचास साल पहले एक अप्रैल को सर्वोदय केंद्र गोपेश्वर में वनों को बचाने के लिए आयोजित इस रणनीतिक बैठक में पेड़ों को ‘अंग्वालठा मारना’ (चिपकना) से ‘चिपको’ विचार अस्तित्व में आया था।
चिपको नेता भट्ट ने कहा कि जहां एक दौर में समाज ने अपने सामूहिक प्रयासों से जंगल कटने से बचाये थे तो वहीं आज हमारे समक्ष वनाग्नि से धधकते जंगलो को बचाने की चुनौती है जिसके लिए युवाओं को आगे आना ही होगा।
वनों को हमारे अस्तित्व का आधार बताते हुए भट्ट ने चिपको के अपने संस्मरणों को भी साझा किया और बताया कि हिमालय के इस छोटे से कस्बे में आयोजित बैठक में वनों को बचाने के लिए निकले ‘चिपको’ का यह संदेश वन और पर्यावरण बचाने का महत्वपूर्ण हथियार वन चुका है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में समाज के हर वर्ग की भूमिका रही जबकि महिलाओं ने इसमें बढ़ चढ़कर भागीदारी निभाई। उन्होंने कहा कि यह सभी के सामूहिक प्रयासों का प्रतिफल था कि हिमालय की इस उपत्यका से उठी आवाज ने सारे विश्व को गुंजायमान किया।
पर्यावरण कार्यकर्ता विनय सेमवाल और रमेश थपलियाल ने कहा कि जंगलों को वनाग्नि से बचाने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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