नैनीताल । कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर, वनस्पति विज्ञान विभाग के शोधार्थियों ने हिमालयी जैव विविधता अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विभाग के शोधार्थियों और वैज्ञानिकों की टीम ने देश में पहली बार एक दुर्लभ जैली फंगस *ग्यूपिनोप्सिस अल्पाइना* (Guupiniopsis alpina) की खोज की है। सुनहरे पीले रंग की यह दुर्लभ फंगस “अल्पाइन जेलीकोन” के नाम से जानी जाती है और इसे नैनीताल के समीप पंगोट क्षेत्र में सड़ती हुई लकड़ी पर उगते हुए पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार अब तक यह प्रजाति केवल ईरान और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में ही दर्ज की गई थी। ऐसे में भारतीय हिमालयी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी का पता चलना न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी और सूक्ष्म जैव विविधता पर नए शोध के रास्ते भी खोलता है। इस खोज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। शोध से संबंधित फंगस की तस्वीर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका *Current Science* के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित की गई है, जिसे शोधकर्ताओं के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। शैक्षणिक भ्रमण के दौरान हुई दुर्लभ खोज जानकारी के अनुसार अगस्त 2024 में डीएसबी परिसर के एमएससी वनस्पति विज्ञान के छात्रों का एक दल विभाग की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रभा पंत के नेतृत्व में पंगोट क्षेत्र के शैक्षणिक भ्रमण पर गया था। यह भ्रमण मुख्य रूप से क्षेत्रीय वनस्पतियों और कवकीय विविधता के अध्ययन के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। इसी दौरान छात्रों की नजर सड़ती हुई लकड़ी पर उग रहे एक असामान्य जैलीनुमा कवक पर पड़ी। इसकी संरचना और रंग अन्य सामान्य फंगस से अलग दिखाई देने पर नमूने एकत्र किए गए। बाद में विभाग के डॉ. कपिल खुल्बे के नेतृत्व में इन नमूनों को वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं फंगस विशेषज्ञ डॉ. एन.के. हर्ष के पास परीक्षण के लिए भेजा गया। प्राथमिक जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह वही दुर्लभ प्रजाति है, जिसकी मौजूदगी अब तक भारत में दर्ज नहीं की गई थी। इसके बाद विभागीय प्रयोगशाला में विस्तृत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक परीक्षण किए गए, जिनमें इसकी पहचान *Guupiniopsis alpina* के रूप में प्रमाणित हुई। वैज्ञानिकों के सामने बड़ा सवाल — महाद्वीपों के पार कैसे पहुंचे बीजाणु? इस खोज ने वैज्ञानिक समुदाय के सामने कई रोचक प्रश्न भी खड़े किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इतने सूक्ष्म फंगस के बीजाणु हजारों किलोमीटर दूर स्थित महाद्वीपों के बीच कैसे पहुंचे। डॉ. कपिल खुल्बे के अनुसार जिस प्रकार पौधों के बीज प्राकृतिक माध्यमों से लंबी दूरी तय करते हैं, उसी प्रकार प्रवासी पक्षी भी संभवतः फंगस के बीजाणुओं के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते होंगे। पक्षियों के पंखों, पैरों या उनके प्रवास मार्गों के माध्यम से बीजाणु एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, वायु प्रवाह और पारिस्थितिक परिस्थितियों में बदलाव भी इस प्रकार के दुर्लभ जीवों के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यह खोज केवल एक नई प्रजाति की उपस्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपे जैव-भौगोलिक कारणों को समझना भी वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। शोध की विशेषता — केवल खोज नहीं, वैज्ञानिक विश्लेषण भी सामान्यतः फंगस से संबंधित अध्ययनों में केवल नई प्रजाति की उपस्थिति दर्ज कर दी जाती है, लेकिन इस शोध की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें भारत में इस प्रजाति के मिलने के संभावित कारणों पर भी वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। शोधकर्ताओं ने इसके “विस्थापित वितरण” (Disjunct Distribution) को समझाने के लिए लंबी दूरी के प्रसार की परिकल्पना दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अध्ययन भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों में फंगस की उत्पत्ति, उनके प्रसार और पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभाव को समझने में उपयोगी साबित हो सकता है। पंगोट क्षेत्र में फंगल विविधता की नई उम्मीद इस खोज के बाद वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि पंगोट और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में दुर्लभ कवकों की और भी कई प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यवस्थित अध्ययन किया जाए तो इस क्षेत्र का विस्तृत “फंगल बेसलाइन डेटा” तैयार किया जा सकता है, जो भविष्य के जैव विविधता अनुसंधान और संरक्षण योजनाओं के लिए बेहद उपयोगी होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव और कवक पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मृत जैविक पदार्थों के विघटन, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता में अहम योगदान देते हैं। अनुसंधान एवं नवाचार फाउंडेशन का मिला सहयोग डॉ. कपिल खुल्बे ने बताया कि यह शोध कार्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डी.एस. रावत के प्रयासों से स्थापित अनुसंधान एवं नवाचार फाउंडेशन के आर्थिक सहयोग एवं प्रोत्साहन से संभव हो सका। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। कुलपति प्रो. रावत ने इस उपलब्धि को हिमालयी जैव विविधता अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए शोध टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अध्ययन भविष्य में पर्वतीय पारिस्थितिकी, जैव विविधता संरक्षण और फंगल संसाधनों पर आधारित वैज्ञानिक अनुसंधानों को नई दिशा देंगे। Post navigation ऊर्जा बचत, ईवी नीति और स्वैच्छिक चकबंदी पर धामी कैबिनेट के बड़े फैसले चारधाम यात्रा ने पकड़ी रिकॉर्ड रफ्तार, 25 दिनों में 12.60 लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन