उत्तराखंड की बिखरी कृषि को यदि व्यावसायिक बनाना है, तो सर्वप्रथम उसका पुनः अभिलेखीकरण (बन्दोबस्त ) एवं चकबंदी की जानी बहुत ही आवश्यक है। गांवों में खेत का उपयोग कौन कर रहा है और खेत नाम किसके है, इसमें बड़ा गड़बड़ है, इसको बड़े स्तर पर अभियान चला कर सुधारना होगा। बिखरी जोत लाभकारी कैसे हो सकती है? किन्तु चकबंदी में आपसी सहमति (सामाजिक सहमति ) पहले जरूरी है। अनेक गावों ने यह करके भी दिखाया है। पहले भी खेतों को काश्तकार आपस में (संंटाबंंटा) बांटते थे। उस विधि को पहले अपनाएं। चकबन्दी से जंगली जानवरों से कुछ हद तक मुक्ति मिल सकती है। उद्यानिकी विकसित हो सकेगी इसके लिए छानी व्यवस्था (खेतों के आसपास ही अस्थायी घर ) को पुनः जीवित करना होगा। चकबंदी के प्रणेता गणेश गरीब ने इस दिशा में ऐतिहासिक पहल की है जो काफी हद तक सफल भी रही है आज इस ऐतिहासिक कार्य से ही आत्मनिर्भर उत्तराखंड की कल्पना साकार होगी। सरकार इस अभियान को अपनी शीर्ष कार्यसूची में शामिल कर इस समस्या का निदान से पलायन को रोका जा सकता है।
@राम प्रकाश पैन्यूली महामंत्री, उत्तरांचल उत्थान परिषद

By उत्तराखंड संवाद भारती

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