देहरादून/मेरठ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ एवं समर्पित प्रचारक धर्मवीर सिंह के निधन से संघ परिवार सहित सामाजिक एवं राष्ट्रवादी संगठनों में शोक की लहर दौड़ गई है। 79 वर्ष की आयु में 23 जून 2026 की रात्रि लगभग 9 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। पिछले 11 दिनों से वे गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में भर्ती थे। उनके निधन को संघ कार्यकर्ताओं ने एक युग का अंत बताया है।

धर्मवीर सिंह का जन्म 24 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद के अस्करीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ सिंह तथा माता का नाम मूंगिया देवी था। जन्म के एक वर्ष बाद ही उनकी माता का निधन हो गया था, जिसके कारण उन्हें मातृ स्नेह का सुख नहीं मिल पाया। उनका पालन-पोषण उनके दादा शिवनाथ सिंह ने किया, जो स्वतंत्रता सेनानी और आर्य समाज के सक्रिय कार्यकर्ता थे। दादा के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया और राष्ट्रसेवा का भाव उनके भीतर बचपन से ही विकसित हुआ।

संघर्षों के बीच पूरी की शिक्षा

धर्मवीर सिंह का बचपन आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बीच बीता। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव में प्राप्त की तथा 1964 में गोहावर (बिजनौर) से कक्षा 11 उत्तीर्ण की। खराब स्वास्थ्य के कारण वे उस समय इंटरमीडिएट की परीक्षा नहीं दे सके, लेकिन शिक्षा के प्रति उनकी लगन कम नहीं हुई। लगभग दो दशक बाद 1984 में उन्होंने आगरा से व्यक्तिगत छात्र के रूप में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण कर अपनी अधूरी शिक्षा पूरी की।

शाखा से शुरू हुआ संघ जीवन

वर्ष 1966 में वे अपने मामाजी के गांव बसेड़ा कुंवर में रह रहे थे, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा लगती थी। ममेरे भाई ओमप्रकाश सिंह के साथ वे शाखा जाने लगे। कुछ समय बाद शाखा बंद हो गई, लेकिन संघ के मंडल कार्यवाह महेंद्र जी ने उन्हें शाखा संचालन की विधि सिखाई। इसके बाद धर्मवीर सिंह ने स्वयं मुख्य शिक्षक बनकर शाखा का पुनः संचालन शुरू किया। यही उनके संघ जीवन की वास्तविक शुरुआत थी।

नौकरी छोड़कर चुना राष्ट्रसेवा का मार्ग

1967 से 1971 तक उन्होंने रामगंगा बांध परियोजना के कालागढ़ स्थित प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में फार्मेसी विभाग में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने संघ के तीनों शिक्षा वर्ग पूर्ण किए। संघ विचार और राष्ट्रसेवा के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूर्णकालिक प्रचारक बन गए।

आपातकाल में निभाई अग्रिम पंक्ति की भूमिका

प्रचारक बनने के बाद उन्हें चमोली, जोशीमठ और कर्णप्रयाग जैसे क्षेत्रों में कार्य करने का अवसर मिला। वर्ष 1975 में उन्हें चमोली जिला प्रचारक बनाया गया, लेकिन उसी समय देश में आपातकाल लागू हो गया और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

यह वह दौर था जब संघ कार्यकर्ताओं को लगातार प्रशासनिक दबाव और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा था। धर्मवीर सिंह ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद संगठन का कार्य नहीं छोड़ा। वे पहाड़ों के दुर्गम रास्तों से पैदल चलकर एक गांव से दूसरे गांव पहुंचते थे और कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाए रखते थे।

कई बार पुलिस से बचने के लिए उन्होंने जंगलों और पैदल मार्गों का सहारा लिया। संघ कार्य को जीवित रखने के लिए उनका यह संघर्ष आज भी पुराने स्वयंसेवकों के बीच प्रेरणा का विषय है।

‘साइकिल वाले प्रचारक’ के नाम से मिली पहचान

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में धर्मवीर सिंह को विशेष रूप से “साइकिल वाले प्रचारक” के नाम से जाना जाता था। उस समय पहाड़ों में सड़क और परिवहन की सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन उन्होंने इसे कभी बाधा नहीं बनने दिया।

साइकिल पर सवार होकर वे दूर-दराज के गांवों तक पहुंचते थे। कई बार उन्हें घंटों और दिनों तक कठिन यात्राएं करनी पड़ती थीं, लेकिन संगठन विस्तार और समाज जागरण के अपने संकल्प से वे कभी पीछे नहीं हटे। उत्तराखंड के अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक बताते हैं कि धर्मवीर सिंह ने ऐसे समय में संघ की शाखाओं को जीवित रखा जब संसाधन लगभग न के बराबर थे।

उनकी सादगी, अनुशासन, समर्पण और अथक परिश्रम ने उन्हें पहाड़ के कार्यकर्ताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया था।

उत्तराखंड से पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक संगठन विस्तार में योगदान

आपातकाल समाप्त होने के बाद उन्होंने पुनः चमोली जिले का कार्य संभाला। बाद में स्वास्थ्य कारणों से उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में दायित्व दिए गए। उन्होंने नकुड़, हरदोई, पीलीभीत, रामपुर, चांदपुर, नोएडा और दादरी में नगर एवं तहसील प्रचारक के रूप में कार्य किया।

इसके अतिरिक्त वे आगरा प्रांत कार्यालय, उत्तरांचल प्रांत कार्यालय देहरादून, केशव धाम वृंदावन, अल्मोड़ा तथा मुरादाबाद में भी विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते रहे। सेवा प्रमुख, कार्यालय प्रमुख और संगठन विस्तार जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने सफलतापूर्वक संपन्न किए।

वरिष्ठ प्रचारकों का मिला सान्निध्य

संघ कार्य के दौरान उन्हें संघ के अनेक शीर्ष प्रचारकों और नेताओं का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। इनमें रज्जू भैया, अशोक सिंघल, भाऊराव देवरस, माधवराव देवड़े, गजेन्द्र दत्त नैथानी सहित अनेक वरिष्ठ प्रचारकों का विशेष स्नेह और सहयोग शामिल रहा।

कमजोर शारीरिक संरचना के बावजूद उनके भीतर अद्भुत इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प था। जो भी दायित्व उन्हें सौंपा जाता, वे उसे पूरी निष्ठा और ऊर्जा के साथ निभाते थे।

एक युग का अंत

अपने जीवन के 50 से अधिक वर्ष धर्मवीर सिंह ने राष्ट्र, समाज और संगठन की सेवा में समर्पित किए। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की अपेक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान दिया।

संघ कार्यकर्ताओं का कहना है कि धर्मवीर सिंह जैसे प्रचारक केवल संगठन नहीं बनाते, बल्कि पीढ़ियों को संस्कार और प्रेरणा देते हैं। उनका जीवन त्याग, तपस्या, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का जीवंत उदाहरण था।

उनके निधन से उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों स्वयंसेवकों ने अपने मार्गदर्शक, संरक्षक और प्रेरणास्रोत को खो दिया है। संघ परिवार ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि धर्मवीर सिंह का संपूर्ण जीवन राष्ट्रभक्ति और संगठन समर्पण की अमूल्य विरासत के रूप में सदैव स्मरण किया जाएगा।

By उत्तराखंड संवाद भारती

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