#फूलदेई_फेस्टिवल_उत्तराखंड

प्रकृति देवी की उपासना का प्रतीक फूल संक्रान्ति

कौन हो तुम वसंत के दूत,
विरस पतझड़ में अति सुकुमार।
घन तिमिर में चपल की रेख,
तपन में शीतल मंद बयार।
हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद जी की ‘कामायनी’ में लिखी गई उक्त पंक्तियाँ उत्तराखंड के लोकपर्व ‘फूलदेई’ या ‘फूल संक्रान्ति’ की सटीक व्याख्या करती हैं।

प्रकृति का लोकपर्व फूलदेई

चंद्रशेखर तिवारी (दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र) मनुष्य का जीवन प्रकृति के साथ अत्यंत निकटता से जुड़ा है। पहाड़ के उच्च शिखर, पेड़-पौंधे, फूल-पत्तियां, नदी-नाले और जंगल में रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं के साथ मनुष्य के सम्बन्धों की रीति उसके…