✍️ सुरेश भाई


उत्तराखंड के गांवों मे बाघ, तेंदुए और भालू के आतंक से लोग भयभीत है। जंगल और खेत में घास काटने जा रही महिलायें जंगली जानवरों की शिकार बन रही है। ऐसी ही दर्दनाक घटना नवंबर के तीसरे सप्ताह में चमोली जिले के पाब गांव की है।जहां 42 वर्षीय रामेश्वरी देवी सुबह अपने जंगल में घास लेने गई थी लेकिन देर सांय तक जब वह समय पर अपने बच्चों के पास घर नहीं लौटी तो ग्रामीणों ने वन विभाग के साथ मिलकर सर्च अभियान चलाया।जंगल के रास्ते में उनकी घास काटने की दरांती और रस्सी भी बिखरी हुई मिली। लेकिन उनका कोई पता नहीं चला। ढूंढने गये लोगों को निराश होकर लौटना पड़ा। परिवार के लोग रात भर रोते रहे। अगले दिन सुबह फिर ढूंढने गये तो रामेश्वरी देवी एक बांज के पेड़ के पास भालू के हमले से घायल स्थिति में मिली।वह रात में कड़ाके की ठंड में जिंदगी और मौत से लड़ती रही। भालू के हमले से शरीर पर पड़े गहरे घाव से अंधेरे में बिलखती रही।भालू महिला को घायल कर भाग गया था। इसके बावजूद भी उसने जिंदा रहने की आस बांधे रखी। चमोली जिले में वन्यजीवों के हमले में इस वर्ष लगभग 25 लोग घायल हुए जिसमे 12 हमले भालू ने किये हैं। यहां ज्योर्तिमठ, दसौली, पोखरी, देवाल, थराली, कर्णप्रयाग, नंदा नगर क्षेत्र में भी भालू सक्रिय है। जहां कुछ महीने पहले बाढ़ से भी जन-धन की बहुत हानि हुई थी। बाघ और तेंदुए का आतंक पौड़ी जिले में सबसे अधिक है यहां निहालगढ़ और कोटी के पास गिन्नी देवी नाम की एक और महिला घर से लगभग 300 मीटर दूर खेतों में घास काटने गई थी। तभी झाड़ियों में छिपे तेंदुए ने उन पर हमला बोल दिया। जिसकी मौके पर ही मौत हो गई। यहीं पर 50 वर्षीय प्रकाश चंद्र का शव एक सप्ताह बाद जंगल से बरामद हुआ। पोखडा ब्लॉक के बगड़ी गाड़ गांव में भी एक महिला को तेंदुए ने निवाला बनाया था और इसके दो दिन पहले घंडियाल गांव में एक अन्य महिला को भी तेंदुए ने घायल कर दिया था। 17 नवंबर को जिवई गांव में भी एक महिला पर भालू ने हमला किया जिससे उसके चेहरे पर गंभीर चोटें आई है। 1991 में तेंदुए से तीन महिलाओं की जान बचाने वाले रुद्रप्रयाग जिले के भरत सिंह चौधरी को भी भालू ने हमला कर जख्मी किया हैं। उत्तरकाशी में भी अब तक भालू ने 14 हमले किये हैं।

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में अब तक 40 लोगों की जीवनलीला को जंगली जानवरों ने समाप्त कर दिया है। जबकि जानवरों का आतंक अभी जारी है। उत्तराखंड में पिथौरागढ़, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, हरिद्वार, रामनगर, हल्द्वानी, टिहरी, उत्तरकाशी आदि स्थानों पर लगभग 500 से अधिक गांवों में जंगली जानवर खेत, खलियान,रास्ते और घरों की देहली तक पहुंचकर आतंक मचा रहे हैं। कॉर्बैट टाइगर्स रिजर्व, गोविंद वन्य जीव पार्क, राजाजी नेशनल पार्क जैसे अनेक जीव- जंतु और जैव विविधता के लिए संरक्षित अभ्यारण्यों के निकट के गांव में लोग सबसे अधिक दहशत में जी रहे हैं। यहां पर रहने वाले लोगों का आरोप है कि बाहर से मनुष्यों का शिकार करने वाले जानवर बड़ी मात्रा में उनके निकट छोड़े जा रहे हैं। भले ही इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। लेकिन जंगली जानवरों पर नियंत्रण भी नहीं है। जब कहीं भी वन्य जीव और मनुष्यों के बीच संघर्ष के भयानक दृश्य सामने आते हैं तभी वन विभाग और संबंधित वन्य जीव विभाग हरकत में आता हैं और वे लोगों को कहते हैं कि स्वयं सावधान और सुरक्षित रहे।और जंगल में न जाने की सलाह देते हैं। लेकिन जंगली जानवरों पर नियंत्रण करने के लिए क्या व्यवस्था है? इस विषय पर स्पष्ट रूप से कोई प्लानिंग नहीं दिखाई देती है।जंगली जानवरों के लिए संवेदनशील गांव में सबसे अधिक खतरा बाघ और तेंदुए से ही है।महिलाओं को दिन में खेतों में काम करना और जंगल से घास- लकड़ी लाना बहुत ही जोखिम भरा हो गया है। गांवों में तेंदुए लगातार दिखाई देने से स्कूल जाने वाले बच्चे भय के माहौल में हैं। दर्जनों स्कूलों में बार- बार छुट्टी करनी पड़ रही हैं और गांव से दूर बने स्कूलों को पंचायत घरों में शिफ्ट करना पड़ रहा है। इससे घास काटने वाली महिलाओं के जीवन को खतरा है। साथ ही बच्चों की प्राइमारी शिक्षा प्रभावित हो रही है। दूर- दराज में रहने वाले गांव जहां अभी सड़क सुविधा नहीं पहुंच सकी है। वहां तक अपने घरों में लौटने वाले लोगों को भी जंगली जानवरों का डर बना हुआ है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रमुख वन संरक्षक समीर सिंन्हा की उपस्थिति में 50 लाख रुपए वन्यजीवों के हमलों को रोकने हेतु जारी किया है और कैबिनेट की बैठक में जान गंवा रहे लोगों को मुआवजे के रूप में 10 लाख रुपए की सहायता की घोषणा की है। जिससे तात्कालिक राहत तो मिल सकता है लेकिन लंबे समय तक वन्यजीवों के हमले से बचने के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय की आवश्यकता है। जिसमें कहा जा रहा है कि वन विभाग को गांव की उन महिलाओं की सुरक्षा के लिए “वन पुलिस” का गठन करना चाहिए जिनके संरक्षण में महिलाएं जंगल में घास काट कर सुरक्षित घर आ सकती है। इसके साथ ही पंचायत और वन पुलिस को बाघ से निपटने का स्वतंत्र अधिकार मिलना चाहिए। भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार कोई जंगली जानवर मानवीय जीवन के लिए खतरा बनता है या लगातार नुकसान पहुंचा रहा है तो मुख्य वन्यजीव वार्डन उसे मारने, पकडने और नियंत्रित करने का आदेश दे सकता है। अतः कानून भी इंसानी सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है। जंगल के रास्ते पर उगने वाली झाड़ियों को भी समय-समय पर मनरेगा के द्वारा सफाई की जा सकती है। स्थाई उपायों पर ध्यान देने के लिए प्रभावित गांवों के लोगों के साथ मिलकर भी रणनीतिक फैसला लेने होंगे।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है)

By उत्तराखंड संवाद भारती

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